Saturday, 22 March 2014

अथ पंकज पुराण: कहीं शाम ढले पंकज जी घर क्यूँ नहीं आते

       परीक्षा का मौसम सर पर है, इसीलिए पंकज जी काफी शाम गए कोचिंग से नहीं लौटते हैं | पढने में तो बचपन से ही होशियार रहे हैं पंकज जी | उनके घरवाले को उन पर पूरा भरोसा है - "पिंटू एक दिन जरूर कुछ न कुछ करेगा" | घर में उन्हें सब पिंटू ही बुलाता है | पापा के भरोसे को सही ठहराने के लिए ही शायद पंकज जी जोरों से भिरे हुए हैं | बचपन से दसवीं तक अपने क्लास में टॉप ही करते रहे हैं वो, और खास बात ये है कि इसके लिए कभी कोचिंग भी नहीं ली उन्होंने | जो हमेशा बिना किसी ट्यूशन के ही टॉप करता रहा हो, वह भी शहरी शिक्षा व्यवस्था के कुचक्र में फँस कर कोचिंग लेने पर मजबूर हो गया, वह भी शाम ढले तक |
      पढाई भी क्यों न करे पंकज जी, आखिर कितनी मेहनत से उनके पापा पैसा का बंदोबस्त करते हैं सबको पता है |  अब किसानी में कुछ रखा है क्या ? फिर भी वो तो मानो रेगिस्तान में भी दो बूँद जिंदगी के निकाल लाते हैं और अपने बच्चों को पिला देते हैं ताकि उसके जीवन में हरियाली हो सके |
      वो तो हमलोगों को उस दिन आभास हुआ था कि कहीं शाम ढले पंकज जी घर क्यूँ नहीं आते और कौन सी कोचिंग पकड़ रखी है उन्होंने | रात्त में जब एक दिन परचून की दुकान से हमलोग कुछ राशन लेने गए थे तो पंकज जी अपने मजाकिया अंदाज में दुकान वाले का मज़ाक उड़ाते हुए अपने हाथ की अगरबत्ती को, जो अभी ख़रीदा ही था, नचाते हुए गाने लगे थे 'ॐ जय जगदीश हरे - स्वामी जय जगदीश हरे' | ये मज़ाक उस दुकान वाले को हजम नहीं हुई थी | अगले ही दिन उस दुकान वाले ने शाम के समय उन्हें पकड़कर तीन बेल्ट खींच कर लगा दिया 'चटाक - चटाक - चटाक', - "साला लौंडीबाज कहीं का लड़की लेकर घूमता है हरामखोर" | मैंने जैसे ही उस सबको आते हुए देखा था पंकज जी को छोड़कर भाग गया सर पर पैर रखकर | पंकज जी तन कर खड़े हो गए कि 'क्या करेगा', सो पिटकर आ गए |
      घर पहुंचते ही हमलोगों ने पंकज जी का चेहरा 'लाल' देखा तो पूछा था उनसे - "कौन था हो पंकज जी ?" ..... "दुकानदार था"- उन्होंने धीमे स्वर में रूखा सा जवाब दिया | लेकिन हमलोगों को लगा कि उन्होंने "रंगदार था" कहा | हमलोग जोर से हँसने लगे थे - "ओ अच्छा इसीलिए मारा क्या ?" वो चुप रहे, आँख तरेरते हुए अपने घर की छिटकनी लगा ली |
      हमारा प्रश्न घाव पर मिर्च की छिड़काव की भांति हो गया था | हमें पता नहीं था कि हमारा प्रश्न मिर्च है | हम तो बस उत्सुक थे यह जानने के लिये कि उस दुकानवाले ने इन्हें - "लड़की लेकर घूमता है हरामखोर" क्यों कहा, बस | हमें ये पता ही नहीं था कि कभी - कभी हमारी अंध उत्सुकता दूसरों को क्लेशयुक्त भी कर सकती है | इसीलिए उत्सुकता, जिज्ञासा जैसे गुणों पर भी अति पर नियंत्रण रखना बेहद जरूरी है |
      हम अनुमान ही लगा सकते थे - 'कहीं वह किरण तो नहीं ?', 'तो मामला यहाँ तक पहुँच गया और हमलोगों को भनक तक नहीं लगी' 'पंकज जी का शाम वाला कोचिंग शायद किरण के साथ घूमना-फिरना ही है' | इस तरह के भांति-भांति के विचार हमारे मन मस्तिष्क पर हथौडा मारने लगा | लेकिन ये सिर्फ अनुमान ही था तब तक, जब तक कि पंकज जी स्वीकृति की मुहर इस पर न लग जाती |   
      कुछ दिनों तक पंकज जी ने हमलोगों से बात तक नहीं की और हमारी जिज्ञासाओं पर तुषारापात करते रहे | लेकिन अपने हँसमुख व्यक्तित्व को वे आखिर कितने दिनों तक दबा कर रख सकते थे भला | ये हमलोगों को अच्छी तरह पता था कि वे अपने साथियों, अपने मित्रों से नजदीक में रहकर भी दूर नहीं रह सकते हैं | इस घटना के तीसरे ही दिन वो मेरे कमरे में हँसते हुए आए - "भाई साब थोड़ा अपना गैस दीजिये न, मेरा समाप्त हो गया है, दूध गरम करना है" | तीन दिनों के बाद पंकज जी को मुझसे मुख़ातिब होते देखकर मेरे होंठ भी फ़ैल गए - "हाँ हाँ पंकज जी आपका ही है, आप ऐसे ही हमें दर्शन लाभ देते रहें, भगवान करे कल आपका नमक समाप्त हो जाय, परसों हल्दी, चौथे दिन धनिया ....."
        वे मेरी ठिठोली भांप गए और इस प्रकार उनके तीन दिनों के मौनव्रत की हैप्पी ऐंडिंग हुई | मैंने उनसे फिर कभी नहीं पूछा कि पंकज जी उस दिन क्या हुआ था, बल्कि उन्होंने खुद ही बताया था | वास्तव में पंकज जी हमसे कुछ भी गुप्त नहीं रखते थे और दिन से शाम तक की घटनाओं का वृत्तांत रात में हमारी बैठक के समय बताया करते थे, खास कर मुझसे | मुझमे दूसरों की गुप्त और अंतरंग बातों को जानने की अंध उत्कंठा का जन्म वास्तव में इसी कारण से हुआ है | 
    पंकज जी उस दिन भी सारी बातें बता देते लेकिन उनकी पीड़ा को हमारी हंसी ने तीव्र कर दिया था उस दिन |
    "अरे उस दिन आरती नहीं उतारे थे दुकान वाले का इसी से गुस्सा गया था वो, साला छोटका       जात मजाक भी नहीं समझता" |
    "लेकिन इसके लिए वो आपको मारेगा क्या ... हमलोग सुगीत भैया से कहेंगे पंकज जी"
    "कौन सुगीत भैया ?"
    "अरे वो जो गैस सिलेंडर का दुकान करते हैं, वो लोकल हैं न, उस साले दुकानवाले को मजा       चखायेंगे"
      वास्तव में पंकज जी से हमारी हमदर्दी तो थी, दिल से थी, लेकिन हमदर्दी का बयान कर हम उनसे ये राज निकलवाना चाहते थे कि आखिर उस दुकानवाले ने इन्हें "लड़की लेकर घूमता है क्यों कहा" | अगले ही दिन मैं, राजा और पंकज जी गैस सिलेंडर लेकर सुगीत भैया के पास गए और सारी घटना ब्यौरेवार उनके सामने रखी गई |
      सुगीत भैया का हनुमान मंदिर के बगल से जो एक पतली गली गई है, वहीँ घर था | दिखने में छह फुट्टा काले कलूटे नौजवान, हँसते तो उजला- उजला पंक्तिबद्ध दांत ऐसे चमक उठता जैसे काले बादल में बिजली चमक उठी हो |
      पूरी घटना सुनने के बाद उन्होंने जोरो से सांस खींचा तो हमलोगों को यही लगा कि वे उस परचून वाले को बुला कर डाटेंगे, लेकिन नहीं, वे तो बस नेताजी टाईप आश्वासन देकर भारत- पाकिस्तान वार्ता ही विफल कर दी | सामने में तो नहीं लेकिन वहाँ से निकलकर पंकज जी ने सुगीत भैया को पेटभर गाली पढ़ी - "कमीना कहीं का सब छोटका जात साला ....." | मैंने भी उनके सुर में सुर मिलाया और मिलाते भी क्यों नहीं 'वफ़ा जिनसे की बेवफ़ा हो गए वाली बात हो गई थी मेरे साथ' | हमलोगों ने संयुक्त निर्णय लिया - "चूँकि सुगीत भैया ने कोई मदद नहीं की हमलोगों की इसीलिए उनके दुकान से गैस भरवाना बंद" |
      छोड़िये पंकज जी अब से ज्यादा शाम तक घर से बाहर मत रहियेगा, किसी से लेना - देना मत रखिये, न उधो का लेना - न माधो का देना, बेकार के झंझट में पड़ते हैं आप | पंकज जी भांप गए थे हमारी आतुरता को, मुस्कुराने लगे- "शाम में बतायेंगे माजरा क्या है" |
      दोपहर का समय था, सोच रहा था कि कैसे दिन के पर निकल आए या हमारा वश चलता तो पृथ्वी की घूर्णन गति ही बढ़ा देता, लगभग ऐसे अधीर थे हमलोग पंकज जी का माजरा जानने के लिए | लेकिन ये तो सब जानते हैं इतंजार की घड़ी मौत की घड़ी से कड़ी होती है | मैं अपने कमरे में बैठा था | राजा ने तो उस दिन शाम का खाना बनाना भी त्याग दिया कि कहीं लैला- मजनू की कहानी सुनने से वंचित न रह जाए और वह भी खुद मजनू की जुबानी | और उधर पंकज जी के नये भराए गैस पर दूध उबल गया था बहुत जल्दी, शायद वह भी अधीर था आज, इसीलिए अपना कार्य जल्द से जल्द निबटा लेना चाह रहा था ताकि चैन से बैठकर श्रृंगार रस का आनंद ले सके |
      जब आपकी किसी से मिलने की छटपटाहट होती है, आप बहुत व्यग्र होते हैं और आप बस मिलने ही वाले होते हैं उससे, तो कभी-कभी नियति को यह मंजूर नहीं होता और वायु का एक तीव्र झंझा आपके मिलन को नाकाम कर देता है |
      कुछ ही देर पीछे बाबा (मकान मालिक) को 'पंकज - पंकज' पुकारते हुए पंकज जी के कमरे में जाते हुए देखा था | कान खड़े हो गए हमारे लेकिन सुन नहीं सके हमलोग कि क्या कहा उन्होंने पंकज जी को | कुछ ही देर बाद पंकज जी अपना आधा लीटर दूध से भरा हुआ बर्तन लेकर आए - "हम जा रहे हैं घर"
      "क्यों क्या हुआ अचानक" - विस्मय होकर हमलोगों ने एक ही साथ पूछा |
      "घर से फोन आया था बाबा को .... दादी ख़तम हो गई"
हमलोग तो सन्न रह गए ये सुनकर | ये अलग बात है कि दादी बूढ़ी थी लेकिन मरने वाली तो कतई नहीं थी अभी |
     "सात बजे वाली ट्रेन पकड़ लीजिये लेकिन वहाँ पहुँचते-पहुँचते तो नौ बज जायेगा, अभी ही फोन कर दीजिये स्टेशन पर से तो कोई आ जायेगा नौ बजे उगना हाल्ट पर लेने के लिए"
      "हाँ देखते हैं जो गाड़ी पहले मिल जायेगी उसी से निकल जायेंगे"

     पंकज जी चले गए तो हमारी शामें उदास हो गई, मानों किसी की मांग उजड़ गई हो | किरण मायूस हो गई, उसे तो पता भी नहीं कि पंकज जी अचानक कहाँ गायब हो गए | मुझे पक्का विश्वास है कि उसका पढने में मन तो कतई नहीं रमता होगा | फुदकना बंद हो गया और हमेशा रेलिंग के सहारे कुर्सी टिकाकर बैठी रहती, इस आशा में कि खुल जा सिमसिम की तरह वह भी कहेगी - "खुल जा पंकज जी की खिड़की" और खिड़की हौले-हौले धीरे-धीरे .........
                                                                    

Monday, 3 February 2014

अथ पंकज पुराण - (राम-श्याम-किरण- 2)

(कहानी में तारतम्यता बनाए रखने के लिए कृपया सर्वप्रथम "राम-श्याम किरण-1" पढ़े http://vivekmadhuban.blogspot.in/2013/12/1.html
       राम-श्याम का घर फिल्ड के बगल में ही था और वहीं किरण का भी घर था, इसीलिए दिन में चार पाँच बार तो दोनों भाई को चंद्रमुख का नियमित दर्शन लाभ मिल ही जाया करता था | किरण किसी भी काम से घर से निकलती बालकोनी में या फिर नीचे लाउन में, जैसे दिन में फुल चुनना और शाम में क्रिकेट देखना तो नित्य कर्म में ही शामिल था, तो दोनों भाई आत्ममुग्ध होकर यही सोचता कि वह मेरे लिए ही निकलती है |
       किरण इन सब बातों से अनभिज्ञ थी कि कोई सरे आम उसके रूप से लवण प्राप्त कर रहा है और ये वो लोग हैं जो उसके भाई के मित्र हैं तथा जिसे वो भी भाई ही समझती है | राम-श्याम जब भी किरण के घर जाता किसी काम से (कार्य जानबूझकर और जबरदस्ती पैदा किया जाता था ताकि ‘उससे’ कुछ बात हो जाए) और गेट खटखटाने पर यदि किरण निकलती तो वह उसे ‘भैया’ ही संबोधन करती | किरण को इस बात का अहसास तब भी नहीं हुआ जब वह साईकिल लेकर ट्यूशन निकलती है तो छोटा भाई श्याम भी उसी समय निकलता है और जबकि उसका कोचिंग कहीं दूसरी तरफ है तत्पश्चात भी वह पीछे – पीछे कुछ फासला बनाकर प्रतिदिन जाता है | बड़ा भाई राम भी ठीक उसी समय प्रतिदिन अपनी खिड़की खोले जोकि किरण की ग्रिल के बिल्कुल सामने था, बैठा रहता है, हाथ में एक किताब लेकर और ग्रिल पर नजरे जमाए |
       वैसे तो न राम को श्याम के बारे में कोई शक था और न श्याम अपने भैया को प्रतिस्पर्धी समझता था | दोनों को एक दूसरे की हकीकत का पता कभी नहीं चल पाया क्योंकि दोनों में से किसी को भी किरण ने हरी झंडी नहीं दिखाई |
       किरण को सर्वप्रथम श्याम ने लाल रंग के बंद लिफ़ाफ़े पर सुगंधित इत्र छिड़क कर अपनी प्रेम-पत्र दिया | किरण समझ ही नही सकी कि श्याम भैया ये क्या दे रहे हैं |
       “इसमें क्या है भैया ?”
       “इसे बाद में पढ़ लेना” – इतना कहकर श्याम अपनी साईकिल को रफ़्तार देकर उस दिन आगे निकल गया था, कुछ संकोचवश, कुछ लज्जावश और कुछ भयवश, आखिर पहला प्रेम-पत्र जो था उसका |
“किरण कुमारी
मैं इंटरमीडियेट कॉमर्स का छात्र हूँ श्याम| मुझे क्रिकेटर बनना है | बैटिंग, बॉलिंग और कीपिंग तीनों कर लेता हूँ ये तो तुमको पता ही है क्योंकि तुम बालकोनी से देखती रहती हो मेरा मैच | हमारा खेल तुमको कैसा लगता है | अच्छा लगे तो ताली बजाना कभी-कभी | तुम बहुत अच्छी हो | मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ | ये बात किसी को मत बताना, हमको बहुत डर लगता है|
                                                             तुम्हारा अपना
                                                          श्याम कुमार मिश्र (कन्हैया)”

      किरण अवाक रह गई वह पत्र-पढ़कर | कुछ देर के लिए मन में एक गुदगुदी हुई थी लेकिन जिसे हमेशा से भैया कहती आ रही है उससे आखिर ये वाला प्यार कैसे हो सकता है भला और श्याम भैया कोई इतने स्मार्ट भी नहीं हैं कि लड़कियाँ उनकी तरफ स्वतः आकर्षित हो जाय | किरण गंभीर हो गई थी वह पत्र पढ़कर, लेकिन मात्र कुछ दिनों के लिए ही, जब तक कि श्याम कुमार मिश्र उर्फ़ कन्हैया का बड़ा भाई राम कुमार मिश्र ने भी एक प्रेम-पत्र नहीं थमाया था किरण को|
      श्याम के इस प्रेम-पत्र प्रसंग के दो तीन बाद ही श्याम अपने गाँव चला गया था कुछ दिनों के लिए| दादी की तबीयत खराब थी इसीलिए एक का जाना आवश्यक हो गया था | राम ने उचित अवसर जानकार बिना लिफ़ाफ़े के बिना लकीर वाले सादे पन्ने पर अपना प्रेम आवेदन प्रस्तुत किया था किरण को | राम तो बड़ा शर्मीला बंदा निकला, पत्र देकर अपने भाई की तरह खड़ा भी नहीं रहा कुछ देर और न किरण को कुछ पूछने का ही मौका दिया, बल्कि सीधे कट लिया वह से |
“किरण जी हम आपको बहुत चाहते हैं जब से पहली बार देखें है तब से ही | हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना | आपके पत्र के इन्तजार में आपका प्रेमी राम |”
      किरण, जो श्याम के पत्र से कुछ गंभीर हो चली थी, राम के पत्र ने उस गंभीरता का गला घोंट कर उसे हँसते-हँसते लोट-पोट कर दिया | उसने यह ठान लिया कि चलो दोनों भाई को कुछ न कुछ प्रतिउत्तर तो देना ही चाहिए ताकि फिर से वह ऐसी हिमाकत न करे | मुझे नहीं पता था कि एक कॉलेज में पढने वाले लड़कों से हाई स्कूल में पढने वाली लड़की कहीं अधिक समझदार होती है| 

Saturday, 21 December 2013

अथ पंकज पुराण - (राम-श्याम-किरण) - 1

        हमारी खिड़की के बाहर का जो क्रिकेट मैच हुआ करता था बड़ा ही रोमांचकारी | हरेक उम्र के खिलाड़ी, छोटा सा फिल्ड, नए-नए नियम जो प्रायः प्रतिदिन बदलते रहते और उसके दर्शकगण जोकि खिलाड़ियों के पारिवारिक कुटुंब ही थे, के कारण मैच का रोमांच चरम स्तर का चुम्बन करने लगता | हाँ, उस क्रिकेट की खास बातों में से एक यह भी थी कि उसमे किसी अम्पायर की व्यवस्था नहीं थी | कारण, आरंभ में तो इसकी व्यवस्था की गई थी लेकिन अंपायर मैच को रोमांचक बनाने का हिस्सेदार बनने के लिए खुद भी खेलने की जिद करने लगता था, अंततः अंपायर व्यवस्था को ही रद्द कर दिया गया | इस खेल का एक और नियम था कि विपक्षी टीम के खिलाड़ी को भी अपनी टीम की बैटिंग के समय फील्डिंग करनी पड़ती थी, हालाँकि यह नियम कुछ लचीला था, गोया कि खिलाड़ियों की संख्या ज्यादा हो जाती तो यह नियम लागू नहीं होता |
        हमलोग अपनी खिड़की से क्रिकेट का दर्शक बनते और किरण अपनी बालकोनी से | किरण के दर्शक बनते ही कॉलोनी में नए-नए खिलाड़ी पैदा होने लगे थे | खिलाड़ी की संख्या इसीलिए भी बढ़ने लगी क्योंकि अब दूसरे कॉलोनी के लड़कों के लिए भी यहाँ का अनुशाषित फिल्ड, यहाँ के प्रतिदिन परिवर्तनकारी नियम और यहाँ के देवलोक साम्य दैदीप्यमान दर्शकगण आकर्षण का कारण बन गए थे |
        किरण के भाई को छोड़कर सारे खिलाड़ी अपनी-अपनी भूमिका का निर्वहण करने में पूरी जान लगा देते, जिससे कि किरण की नजर का सुगन्धित झोंका उस पर भी पड़े | बल्लेबाज ताबड़तोड़ रन बनाने की कोशिश करता – ये गई गेंद बाउंड्री लाईन से बाहर और आऊट (यहाँ का नियम ही यही था)- और बॉलर पिछवाड़े से जोर लगा कर गेंद फेंकता जैसे कि साक्षात शोएब अख्तर हों |
        किरण को इस बात की ओर तनिक भी ध्यान नहीं था कि खिलाड़ियों की भीड़ अचानक से क्यों बढ़ने लगी है | वास्तव में वह भले ही शारीरिक रूप से बालकोनी से मैच देख रही हो लेकिन मानसिक रूप से वह पंकज जी की खिड़की से होकर उसके कमरे में पहुँच गई होती थी |
       कॉलोनी के ही कुछ लड़के जो किरण को कॉलोनी की अमानत समझते थे यह सोचकर खासे बेचैन रहते कि यदि दूसरी कॉलोनी से इन उच्चवर्गीय खिलाड़ियों का यूँ ही आयत होता रहा तो हो न हो इस कॉलोनी की अमानत को कोई और उड़ा ले जाएगा और हमलोग हाथ मलते रह जायेंगे| अमानत के इन तथाकथित पहरेदारों के चेहरे पर फ्यूज उड़न भाव कभी-कभी स्पष्ट दृष्टिगोचर होता था |
        कॉलोनी मे वहीँ फिल्ड के बगल में एक जुड़वा भाई रहता था- राम और श्याम | दोनों ग्रैजुएशन का छात्र था, उस कॉलोनी क्रिकेट का पुराना और जिम्मेदार सदस्य तथा साथ ही जुझारू खिलाड़ी भी था | शक्ल-सूरत से लेकर सीरत तक दोनों की बिलकुल ही एक जैसी थी | हमलोगों की ज्यादा बातचीत नहीं हुई थी उससे आरंभ में इसीलिए क्रिकेट खिलाड़ी के तौर पर हमलोग दोनों को उसकी हँसने की अलग-अलग शैली से ही भिन्न-भिन्न कर पाते थे | राम, बड़ा भाई जब हँसता तो उसके मुँह के सारे दांत बाहर निकलने के लिए बेताब होने लगते जबकि श्याम हँसने के समय होठों को दबाने की असफल कोशिश करता और उसके बायें गाल पर एक डिम्पल भी उभर आता |
        दोनों भाई चूँकि कुछ सालों से वहीं रह रहे थे इसीलिए अब स्वंय को उस कॉलोनी का ही सदस्य समझने लगे थे | अतः “कॉलोनी में कोई असामाजिक कृत्य नहीं होने देने का सारा क्षार-भार अपने कंधों पर उठाये फिरते थे” वे दोनों | उनकी स्थिति कुछ-कुछ वैसी ही थी जैसे एक मुहल्ले  के आवारा कुत्ते अपने मुहल्ले में भोज होने पर दूसरे मुहल्ले के आवारा कुत्तों को पास फटकने नहीं देते |
         वहाँ जैसे है खिलाड़ियों का आयत होने लगा दोनों भाईयों की श्वान नासिका ने खतरों को सूंघ लिया | कॉलोनी क्रिकेट निर्माता खिलाड़ियों के बीच अब यह नियम बनाने का मुद्दा जोर शोर से उठाया जाने लगा कि केवल अपनी कॉलोनी के खिलाड़ी ही उस क्रिकेट में शामिल हो सकते हैं | लेकिन इस नियम के बनने से पडोसी कॉलोनी से संबंध बिगड़ने का डर था इसीलिए यह नियम बनाना तलवार की धार पर चलने जैसा था और अधिकांश अपनी मित्रता को भी यथावत रखना चाहते थे इसलिए यह नियम पारित नहीं हो सका |

        राम-श्याम की भी हालाँकि दूसरे कॉलोनी वालों से मित्रता थी, लेकिन वो दोनों नहीं चाहते थे कि बाहर से आये लड़के क्रिकेट खेलने के अतिरिक्त ध्यान दर्शकों पर लगाए, विशेषकर किरण के मुखकमल का रसपान करे | क्योंकि, दोनों भाई प्यार करते थे किरण से और वो भी एकतरफा वाला प्यार | दोनों का प्यार ‘गोदान’ की ‘मालती’ के लिए ‘मेहता’ का प्यार था, एक खूंखार शेर जो अपनी शिकार पर किसी की नजर नहीं पड़ने देता | खास बात ये थी कि चूँकि दोनों सहोदर भाई थे और अभी छात्र जीवन में ही गमन कर रहे थे इसीलिए अपने एकतरफा प्रेम-प्रसंग का पर्दाफास एक दूसरे के समक्ष करने से घबराते थे, या ये कहूँ कि डरते थे तो अधिक युक्तिसंगत होगा |  
                                                                     ........ क्रमशः 

Monday, 9 December 2013

अथ पंकज पुराण : "प्रेम गली से हाइवे तक" (2)

        पंकज जी ने फटाक से दरवाजा बंद कर लिया और यहाँ तक कि उस दिन खोला ही नहीं | अगले दिन जब पंकज जी के समक्ष यही प्रसंग पुनः खोदा गया तो वो मुस्कुरा भर दिए | उन्होंने फिर खुद ही बताया कि किरण ने ग्याहरवीं में नवोदय छोड़कर दरभंगा में ही रहने का फैसला किया है - 
"यहाँ मेडिकल की अच्छी तैयारी होती है न इसीलिए, स्कूल के साथ - साथ मेडिकल की भी तैयारी करेगी" | "आपने कहा था क्या पंकज जी, यहीं पर रहो दरभंगा में ही" 
"हाँ मैंने एक बार ये तो कहा था कि नवोदय जहाँ पर है वहाँ तो मेडिकल की कोचिंग भी नहीं है, इस पर खुद उसी ने कहा कि ग्यारहवीं में यहीं रहूँगी"
"चिंता नहीं करने का पंकज जी हमलोग किसी को नहीं बताएँगे और कभी कुछ मदद की जरूरत हो तो हमलोग हैं ही यहाँ पर, मतलब नो चिंता नो फिकर"
        पंकज जी को हमारी मित्रता की वफादारी पर कोई शक नहीं था | वो जानते थे कि हमलोग उनके इस नव अंकुरित प्रेम प्रसंग का ढ़ोल पीटकर उस पर पाला नहीं पड़ने देंगे | इसीलिए वो आश्वस्त होकर इस पौधे को वटवृक्ष बनाने के लिए नियमित रूप से सिंचाई कार्य में जुट गए |         
        ग्रेजुएशन में नया-नया एडमिशन ही लिया था और कॉलेज तो रामभरोसे ही चलता था इसीलिए शुरूआती कुछ सप्ताह के बाद कॉलेज जाना लगभग परमानेंट ही बंद कर दिया पंकज जी ने | दरभंगा जैसे छोटे शहरों में भी प्रोफेसर और टीचर कॉलेज में क्लास इसीलिए भी नहीं लेते थे ताकि छात्रों की भीड़ उनके कोचिंग संस्थानों में इकट्ठी हो और वह अपनी नियत सैलरी के अलावा भी छात्रों से धन बटोर सके | विशेषकर विज्ञानं के छात्रों के समक्ष कोचिंग पढने की मजबूरी हो जाती थी और प्रायः सभी छात्र कोचिंग व्यवस्था के इस मकरजाल में उलझ ही जाता था | 
        पंकज जी भी उसी समय कोचिंग जाते जिस समय किरण स्कूल जाती और सारा कोचिंग शाम तक समाप्त कर दोनों साथ ही आते | लेकिन, दोनों का साथ घर से कुछ आगे जो हनुमान मंदिर था वहाँ से आरंभ होता और वहीँ पर ख़तम ताकि कॉलोनी वालों तक इस खिचड़ी की गंध न पहुँचे |  ये जिन्दगी हनुमान मंदिर से शुरू हनुमान मंदिर पर ख़तम टाइप की स्थिति थी दोनों की | 
        पंकज जी की यह यात्रा बदस्तूर और लगातार जारी रही कल -कल करती नदी की उच्छृंखल धार की तरह | इसके सामने आने वाली छोटी- छोटी स्कूल की छुट्टीनुमा रुकावटें भी बहती चली गई | जब स्कूल में छुट्टी होती  तो किरण यह बहाना करती घर में कि "मम्मी आज एक घंटा पहले से ही कोचिंग होगा, स्कूल में छुट्टी हैं न इसीलिए" | पंकज जी की जब कोचिंग में छुट्टी होती तो वह भी नियत समय पर हनुमान मंदिर से किरण के स्कूल तक की यात्रा के लिए निकलना न भूलते गोया कि तीर्थयात्रा कर रहे हों | 
        मुझे पता नहीं है, लेकिन बखूबी अंदाजा है कि शायद प्रेम करने वालों को एक दूसरे के साथ वक्त गुजारना काफी अच्छा लगता है | इसीलिए तो प्रेम की कसमें हमेशा साथ रहने, साथ जीने, साथ मरने की ही होती है अर्थात हर स्थिति में एक दूजे के लिए बन कर साथ-साथ रहने की अटूट इच्छा चाहे स्थिति सुखद अथवा दुखद | 
        पंकज जी और किरण इस प्रेम-पथ पर आगे बढ़ चले थे और ईशारेबाजी से आरंभ कर छोटा-छोटा साथ की गली से गुजर रहे थे | दोनों की यही तमन्ना थी - कैसे छोटा को बड़ा किया जाय, गली से हाईवे पर पहुँचे और इसकी रफ़्तार जिन्दगी की रफ़्तार से घुल-मिल जाय | परस्पर साथ रहने की भावना का लोप हो जाय और उसके बदले हम साथ-साथ हैं के प्राप्य का समावेश हो जाय | अभी तो काफी लम्बा रास्ता तय करना था दोनों को, जहाँ रस्ते में कांटे भी हैं फूल भी, चन्दन भी हैं धूल भी और जाना है बड़ी दूर बटोही |

Sunday, 24 November 2013

अथ पंकज पुराण : "प्रेम गली से हाइवे तक" (1)

        आजकल पंकज जी का गेट अधिकांशतः बंद ही रहता है, कहते हैं कि पढाई का टेंसन हो गया है इसीलिए वो सीरियस रहते हैं और हमलोग उनके सीरियसपन को देखकर टेंसनाइज हो गए हैं |    
        मुझे क्या पता कि किरण छुट्टी में भी इतना सीरियस रहने वाली लड़की है | ग्यारहवीं में एडमिशन से पहले ही बुक लेकर अपनी बालकोनी में जमी रहती है | बिस्किट का रैपर फेंकने के लिए जैसे ही खिड़की खोला कि देखता हूँ किरण का नयन पंकज जी की खिड़की पर मासूम आघात कर रहा है | पहली बार पता चला कि पढाई भी संक्रामक रोग की तरह होती है लेकिन यहाँ ये नहीं पता कि किसका संक्रमण किसमे फैला है | 
        किसी भी संक्रमण का यथोचित समय में उपचार न किया जाय तो वह कैंसर का रूप पकड़ लेता है और पंकज जी पर हमारा कोई उपचार कारगर हो ही नहीं रहा था | हमलोगों ने कितना समझाया - प्यार के बीमार को उतार मेरे मनवा - लेकिन पंकज जी अपनी बीमारी से प्यार करते हैं और उन्हें बीमारी पैदा करने वाली से तो अटूट प्यार है | 
        "आप भी गजब करते हैं पंकज जी, राह चलते जिस लड़की को देखा आपको प्यार हो जाता है वो भी अटूट वाला प्यार" | पंकज जी जानते हैं हमलोग समीकरण समझ गए हैं लेकिन वो इश्क करते हैं मगर बताते भी नहीं और छुपाते भी नहीं - "अरे यार तुमलोग तो जानते हो मैं खिड़की पहले से ही खोल के रखता हूँ और मैंने थोड़े ही किसी को बालकोनी में बुलाया है, परीक्षा भी सर पर है तो अब से मटरगस्ती तो बंद करना ही पड़ेगा न"| हमलोग हथियार डाल जाते पंकज जी के इस डिफेंसिव स्ट्रोक पर क्योंकि पता है - वो झूठ नहीं बोलते भले ही हकीकत छुपा ले | 
        अब हमारी खुफिया टीम को पकड़ना था रंगे हाथों, पंकज जी को नयनों से नयनों का गोपन प्रिय सम्भाषण करते हुए | मैंने और राजा ने इस गुरुतर कार्य को सफल बनाने के लिए एक कार्ययोजना बनानी आरम्भ कर दी |
        मैं और राजा दोनों एक ही क्लास में पढ़ते थे, एक ही विषय पीसीएम के छात्र थे लेकिन स्कूल अलग-अलग था हम दोनों का | अपना अध्ययन कार्य छोड़कर दूसरों की गतिविधियों पर नजर रखना और अपनी खुफियागिरी के लिए खुद ही अपनी पीठ थपथपाना हमलोगों का फितूर बन गया था | दसवीं तक क्लास में मुझे ही मॉनिटर बनाया जाता था | क्लास में अनुशासन बनाये रखना और गैर-जिम्मेदाराना, असभ्य हरकत करने वालों पर नजर रखने की आदत शायद मेरे व्यक्तित्व में ही घर कर गई थी जो समय और स्थान परिवर्तन के बावजूद भी हमारे शरीर में अड्डा बनाये बैठा हुआ था | इसीलिए सारा काम पेंडिंग में डालकर दूसरों की गतिविधियों पर नजर रखने की छोटी से छोटी गुंजाईश होते ही हम पूरी मुस्तैदी से मॉनिटर बन जाते हैं, अभी भी | 
        जब हमारी यह छोटी खुफिया इकाई ने पंकज जी को रंगे हाथों पकड़ा था किरण का ईशारों-ईशारों में दिल लेते हुए तो हमने उन्हें कुछ नहीं कहा था उस समय बल्कि किरण के ईशारे की कॉपी - सेव कर ली थी दिमाग में और फिर जब उनका ईशारा-कांड समाप्त होने के बाद वही ईशारा मैंने उनपर पेस्ट करना चालू कर दिया था तो कैसे लाजवंती बन गए थे पंकज जी | चेहरे का भाव तो कॉलोनी के ही उस चोर की भांति हो गया था जो चोरी कर लेने के बाद भागते हुए पकड़ा जाता है - 
"हे हे हे हे अरे तुमलोग भी न, यार बहुत अच्छी है किरण नवोदय में पढ़ती है"- पंकज जी सफाई देने लगे | 
"अच्छा तो लगता है पूरा इतिहास भूगोल छान कर बैठे हैं साहब"
"इतिहास-भूगोल कुछ भी नहीं पता है मुझे, वो बराबर देख रही थी इधर तो मैंने पूछा था एक दिन बस"
"आपके 'इधर' ही क्यों मेरे 'इधर' क्यों नहीं पंकज जी, खैर छोडिये और ये बताइए कि सेटिंग कैसे करते हैं हो ?"
        पंकज जी चिढ़ से गए हमारे इस औत्सुक्य मिश्रित बेतुके सवाल पर और यह मुझे आज तक पता नहीं चला कि कोई प्रेमी इस वृत्तांत को क्यों नहीं शेयर करता है किसी से | अनुमान ही लगा सकता हूँ कि सच्चा प्रेमी यह राज कभी नहीं खोलते हैं शायद और जो इस वृत्तांत को चटकारे ले लेकर स्वंय को तीसमारखां दीखाना चाहते हैं वो निःसंदेह सच्चा प्रेमी नहीं हो सकता, उसके लिए तो प्रेम उम्र के एक विशेष पड़ाव पर मनोरंजन का सर्वजनदुर्लभ साधन ही हो सकता है मात्र  |   ....................... क्रमशः 
       
        

Friday, 8 November 2013

अथ पंकज पुराण: बुद्धिमान के लिए ईशारा काफी (2)

(कहानी में तारतम्यता बनाए रखने के लिए कृपया सर्वप्रथम - "बुद्धिमान के लिए ईशारा काफी (1)" पढ़ें http://vivekmadhuban.blogspot.in/2013/10/1_23.html )
        
        माँ उतर रही है धीरे - धीरे अपने सैंडिल से सीढियों को पुचकारते हुए | चाल और चेहरा दोनों में गर्व झलक रहा है | किरण दीवाल की ओट से निकल माँ के साथ हो लेती है और ग्रिल से बाहर निकलने लगती है | दोनों की पीठ पंकज जी की खिड़की की तरफ है | किरण की आँख ग्रिल की कुण्डी पर है और ध्यान पंकज जी की खिड़की पर | अपनी पीठ पर दो आँख गड़ी हुई महसूस कर रही है, मन में गुदगुदी होती है और गर्दन नत हो जाती है | 
        ग्रिल से बाहर निकल किरण ने कुण्डी लगाई और खिड़की की तरफ चोर नजरों से देखा एक बार, पंकज जी मैदान में डटे हुए हैं | पहली बार दोनों की आँखें चार हुई और इधर किरण पुनः गर्दन नत कर शर्मा आंटी के घर के लिए माँ के पीछे हो ली | पंकज जी दोनों हाथों से अपने हार्ट को दबाये खिड़की के नीचे दुबक गए | किसी लड़की से जब आँखों ही आँखों में बाते होती है तो मन पुलकित क्यों हो जाता है ? बातें न भी हो, मौन भी क्यों धड़कन बढ़ा देता है? अजीब विरोधाभास है- धड़कन बढ़ भी जाती है लेकिन हार्ट अटैक का खतरा तक नहीं होता | उत्तर - पता नहीं - पंकज जी अपने ही प्रश्न के आगे निरुत्तर थे | 
        शर्मा आंटी के घर पहुँचकर मम्मी ने कॉलबेल का स्विच दबाया, पाँच मिनट तक किसी ने भी कोई उत्तर नहीं दिया अन्दर एकदम सन्नाटा पसरा रहा | शायद बाहर स्विच तो था लेकिन अन्दर बेल ही ख़राब थी | ग्रिल की कुण्डी खटखटाई तो अन्दर से एक सुरीली आवाज जिसमें जानबूझकर भारीपन लाई गई थी - "कौन है, इतना जोर से खटखटा रहा है ग्रिल को, तोड़ ही दो इससे अच्छा" - शर्मा आंटी की आवाज थी ये - "अरे आप, आइये-आइये, आ जाओ किरण बेटी, ये पता नहीं कौन सब आ जाता हैं और जोर-जोर से पीटने लगता हैं, हथौरा चला रहे हों जैसे, बुरा मत मानियेगा"- शर्मा आंटी शर्मिंदा होकर कुछ दीन स्वर में बोली थी | किरण की माँ समझ रही थी इस बात को | उन्हें भी तक़रीबन प्रतिदिन इस तरह की मुसीबतों से दो-चार होना पड़ जाता था - "बुरा क्यों मानेंगे भला, हमारे ग्रिल को तो लोंगो ने पीट-पीट कर बदरंग बना दिया है, लेकिन अब तो कॉलबेल लगवा दी है मैंने फिर भी लोगों को दिखता ही नहीं" | "हाँ बहुत अच्छा किया, मैं तो इनसे कह-कहकर थक गई कॉलबेल ठीक करवाने के लिए पर ये मेरी सुनते ही कब हैं"- आंटी ने प्रतिउत्तर में कहा - "अच्छा एक मिनट बैठिये मैं चाय बना लाती हूँ" |
"रहने दीजिये चाय-वाय कुछ ही देर में चले जायेंगे इनका टेलीफोन आने वाला है"
"नहीं-नहीं बिना चाय-नाश्ता के नहीं जाने दूंगी मैं, ऐसे भी आप आती ही कब हैं और किरण बेटी भी आई है आज " - शर्मा आंटी इतना कह झटपट किचन में घुस गई |
        किरण को समय काटना पहाड़ सा लग रह है | सोच रही कि कितनी जल्दी यहाँ से उड़कर अपनी बालकोनी में चली जाती | मन ही मन आंटी को कोसती है - "शर्मा आंटी भी न कितना व्यवहारिक होने लगती है, चाय-नाश्ता तो सभी अपने घर से ही करके आते हैं" | किरण बहुत व्यग्र हो रही है, बार-बार घड़ी देख रही है, उठक-बैठक कर रही है किन्तु माँ और आंटी किरण के इस मानसिक उथल-पुथल से अनभिज्ञ कॉलोनी की सारी महिलाओं का कच्चा-चिट्ठा टी-टेबल पर फैलाती जा रही है |
        खैर जैसे-तैसे कॉन्फ्रेस समाप्त हुई और समय का घोडा लंगड़ाते ही सही वह फासला भी तय कर लिया जब किरण अपनी बालकोनी में कुर्सी लगाकर और हाथ में पुस्तक लेकर ऐसे ही जम गई जैसे खिड़की पर पंकज जी |
        ये तो हो गया भैया - फर्स्ट साईट लव वाला मामला | निष्कर्ष यही निकला कि किरण न केवल पढने में होशियार है बल्कि पद्मावत की नागमती की तरह "दुनिया-धंधा' में भी कम बुद्धिमान नहीं है | इसीलिए तो पंकज जी के आँख के इशारे को पलक झपकते ही आत्मसात कर लिया उसने | कहा भी गया है - बुद्धिमान के लिए ईशारा काफी | 

(आपका बहुमूल्य कमेन्ट हमारे लेखनी की जीवन-शक्ति है)

Wednesday, 23 October 2013

अथ पंकज पुराण: बुद्धिमान के लिए ईशारा काफी (1)

        "किरण को जो आप देख लो एक बार बिल्कुल्ले बदल गई गई है, शकल - सूरत से लेकर चाल-व्यवहार तक पहचाने में नहीं आती" - बगल वाली शर्मा आंटी अंकल से कह रही थी "नमस्ते भी किया इस बार, पहले तो कैसे अकड़ी रहती थी …लगता है नवोदय में अच्छी पढाई होती है तभी तो, हमारा दुनू में से एक का भी हो जाता, पढने में तो कितना तेज है हमारा दुनू बच्चा … पक्का किरण के पापा ने कोई जुगाड़ भिड़ाया होगा" । 
        सामने में भले ही तन-मन-धन अर्पण कर दें सभी लेकिन अमीर का बच्चा आवारागर्दी न करे, सभ्य और सुसंस्कृत हो जाए तो पता नहीं कॉलोनी वाले क्यों जलने लगते हैं और हरेक सफलता में षडयंत्र सूंघते हैं । 
        किरण को प्यार है, अटूट प्यार, अपने माँ - बाप से, अपने भाइयों से, अपने दोस्तों से, अपने स्कूल से, अपने घर से, घर की बालकोनी से तथा उन सभी से जिससे उसका जुडाव है, कुछ न कुछ संबंध है । 
        "हमारे घर तो कभी आप आती ही नहीं, कल आइये न और किरण को भी साथ लाइयेगा, जरूर से"- जाते हुए शर्मा आंटी ने कहा था तो बड़ी खुश हुई थी किरण । ऐसा किसी ने पहली बार कहा था -  "किरण को भी साथ लाइयेगा" । मन ही मन सोचती है किरण - "ए किरण ससुराल से आई है क्या रे, कि शर्मा आंटी ने ऐसा कहा - किरण को भी साथ लाइयेगा, जरुर से" । ससुराल से तो नहीं आए हैं लेकिन कभी न कभी तो आयेंगे ही- होठों पर एक मुस्कान तैर जाती किरण के, आवाज नहीं निकलती, मम्मी पूछ ले तो क्या कहेगी और अब चेहरा लाल हो गया किरण का, एकदम सिन्दूरी लाल, होठों को जोर से दबा कर मुस्काई अब वो । 
        वैसे सच तो यही है कि जब लडकियाँ घर से दूर पढने के लिए चली जाती है और एक सामान्य अंतराल पर भी आती है तो घर-परिवार से लेकर आस-पड़ोस वाले भी उसके चेहरे पर ससुराल की चमक खोजते फिरते हैं और ऐसा व्यव्हार, ऐसा प्यार जैसे सचमुच बेटी ससुराल से ही आई हो । 
        किरण आज अपनी माँ के साथ शर्मा आंटी के घर जा रही है । अपनी सीढ़ी से खटाक-खटाक उतर रही है । अभी भी थोड़ा बहुत बचपना है ही किरण में और हो भी क्यों नहीं अभी तो दसवीं की परीक्षा दी ही है उसने । बचपना तो उमर के साथ बढती ही जाती है क्योंकि बचपन में तो लोग अपनी स्वाभाविकता को जीते हैं जबकि बचपना का अभिनय तो बचपन बीत जाने के बाद ही किया जा सकता है । और किरण बचपना क्यों न करे, माँ का ममत्व उसे बचपन की और आकर्षित करता है तो उसकी ;उम्र उसे गंभीर रहने के लिए मजबूर करती है । बालपन और गंभीरता है सुन्दर समायोजन है किरण में । इसीलिए जब वो सीढ़ी से उतरती है तो सैंडिल पटकते हुए खटाक-खटाक-खटाक और जैसे ही खिड़की से पंकज से को अपनी तरफ देखते हुए पाती है, झंडे की तरह लहराता हुआ दुपट्टा व्यवस्थित कर, गर्दन झुका कर दीवाल की ओट में छिपकर माँ की प्रतीक्षा करने लगती है। माँ अभी तक नहीं उतरी है नीचे, कितनी देर से प्रतीक्षारत है किरण - "उफ्फ माँ भी न, बगल में जाना है फिर भी कितना मेकअप करने लगती है"। जब आप किसी की प्रतीक्षा करते हैं तो घड़ी की सुईयों की भी हवा निकल जाती  हैं ।
        पंकज जी खिड़की पर जमे हुए हैं - कब निकलेगी ओट से, एक बार और देखते, सही से देख ही नहीं पाया, पता ही नहीं था इसमें कोई लड़की भी रहती है । पंकज जी को लग रहा है - हो न हो दीवाल में कोई दरवाजा है जिससे अन्दर चली गई होगी लेकिन, उतरी तो छत से है तब नीचे के दरवाजे से ऊपर कैसे जा सकती है, बिना सीढ़ी के, नहीं-नहीं छुपी हुई है - पंकज जी अब भी जमे हुए हैं अपनी खिड़की पर ।   ………… क्रमशः