Tuesday, 26 June 2012

बिजली चमकी बरसो हे

मेरे टूटे कंधो पर अपना मस्तिष्क टिका दो 
मेरी सूनी अंखियों में तारों सी ज्योति जगा दो,
विश्वास नहीं टूटे ये मोरों का नभ के ऊपर
बिजली चमकी बरसो हे अम्बर के बादल भू पर|

जब हवा चली सन-सन से खन-खनके हुआ मन कंगना 
संकेत मिला आओगे लीपा खुद से ही अंगना, 
अंतर की सृष्टि हलचल कर दी हवा ने है छू-छूकर
बिजली चमकी बरसो हे अम्बर के बादल भू पर|

सूरज निकला अंतर में फिर भी अंधियारी छाई
जीवन की फिसलन पथ पर देखो जमी है मोटी काई,
पग पड़ता जहाँ कही भी बस दिखता है मरुस्थल
बिजली चमकी बरसो हे अम्बर के बादल भू पर|