Monday, 3 February 2014

अथ पंकज पुराण - (राम-श्याम-किरण- 2)

(कहानी में तारतम्यता बनाए रखने के लिए कृपया सर्वप्रथम "राम-श्याम किरण-1" पढ़े http://vivekmadhuban.blogspot.in/2013/12/1.html
       राम-श्याम का घर फिल्ड के बगल में ही था और वहीं किरण का भी घर था, इसीलिए दिन में चार पाँच बार तो दोनों भाई को चंद्रमुख का नियमित दर्शन लाभ मिल ही जाया करता था | किरण किसी भी काम से घर से निकलती बालकोनी में या फिर नीचे लाउन में, जैसे दिन में फुल चुनना और शाम में क्रिकेट देखना तो नित्य कर्म में ही शामिल था, तो दोनों भाई आत्ममुग्ध होकर यही सोचता कि वह मेरे लिए ही निकलती है |
       किरण इन सब बातों से अनभिज्ञ थी कि कोई सरे आम उसके रूप से लवण प्राप्त कर रहा है और ये वो लोग हैं जो उसके भाई के मित्र हैं तथा जिसे वो भी भाई ही समझती है | राम-श्याम जब भी किरण के घर जाता किसी काम से (कार्य जानबूझकर और जबरदस्ती पैदा किया जाता था ताकि ‘उससे’ कुछ बात हो जाए) और गेट खटखटाने पर यदि किरण निकलती तो वह उसे ‘भैया’ ही संबोधन करती | किरण को इस बात का अहसास तब भी नहीं हुआ जब वह साईकिल लेकर ट्यूशन निकलती है तो छोटा भाई श्याम भी उसी समय निकलता है और जबकि उसका कोचिंग कहीं दूसरी तरफ है तत्पश्चात भी वह पीछे – पीछे कुछ फासला बनाकर प्रतिदिन जाता है | बड़ा भाई राम भी ठीक उसी समय प्रतिदिन अपनी खिड़की खोले जोकि किरण की ग्रिल के बिल्कुल सामने था, बैठा रहता है, हाथ में एक किताब लेकर और ग्रिल पर नजरे जमाए |
       वैसे तो न राम को श्याम के बारे में कोई शक था और न श्याम अपने भैया को प्रतिस्पर्धी समझता था | दोनों को एक दूसरे की हकीकत का पता कभी नहीं चल पाया क्योंकि दोनों में से किसी को भी किरण ने हरी झंडी नहीं दिखाई |
       किरण को सर्वप्रथम श्याम ने लाल रंग के बंद लिफ़ाफ़े पर सुगंधित इत्र छिड़क कर अपनी प्रेम-पत्र दिया | किरण समझ ही नही सकी कि श्याम भैया ये क्या दे रहे हैं |
       “इसमें क्या है भैया ?”
       “इसे बाद में पढ़ लेना” – इतना कहकर श्याम अपनी साईकिल को रफ़्तार देकर उस दिन आगे निकल गया था, कुछ संकोचवश, कुछ लज्जावश और कुछ भयवश, आखिर पहला प्रेम-पत्र जो था उसका |
“किरण कुमारी
मैं इंटरमीडियेट कॉमर्स का छात्र हूँ श्याम| मुझे क्रिकेटर बनना है | बैटिंग, बॉलिंग और कीपिंग तीनों कर लेता हूँ ये तो तुमको पता ही है क्योंकि तुम बालकोनी से देखती रहती हो मेरा मैच | हमारा खेल तुमको कैसा लगता है | अच्छा लगे तो ताली बजाना कभी-कभी | तुम बहुत अच्छी हो | मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ | ये बात किसी को मत बताना, हमको बहुत डर लगता है|
                                                             तुम्हारा अपना
                                                          श्याम कुमार मिश्र (कन्हैया)”

      किरण अवाक रह गई वह पत्र-पढ़कर | कुछ देर के लिए मन में एक गुदगुदी हुई थी लेकिन जिसे हमेशा से भैया कहती आ रही है उससे आखिर ये वाला प्यार कैसे हो सकता है भला और श्याम भैया कोई इतने स्मार्ट भी नहीं हैं कि लड़कियाँ उनकी तरफ स्वतः आकर्षित हो जाय | किरण गंभीर हो गई थी वह पत्र पढ़कर, लेकिन मात्र कुछ दिनों के लिए ही, जब तक कि श्याम कुमार मिश्र उर्फ़ कन्हैया का बड़ा भाई राम कुमार मिश्र ने भी एक प्रेम-पत्र नहीं थमाया था किरण को|
      श्याम के इस प्रेम-पत्र प्रसंग के दो तीन बाद ही श्याम अपने गाँव चला गया था कुछ दिनों के लिए| दादी की तबीयत खराब थी इसीलिए एक का जाना आवश्यक हो गया था | राम ने उचित अवसर जानकार बिना लिफ़ाफ़े के बिना लकीर वाले सादे पन्ने पर अपना प्रेम आवेदन प्रस्तुत किया था किरण को | राम तो बड़ा शर्मीला बंदा निकला, पत्र देकर अपने भाई की तरह खड़ा भी नहीं रहा कुछ देर और न किरण को कुछ पूछने का ही मौका दिया, बल्कि सीधे कट लिया वह से |
“किरण जी हम आपको बहुत चाहते हैं जब से पहली बार देखें है तब से ही | हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना | आपके पत्र के इन्तजार में आपका प्रेमी राम |”
      किरण, जो श्याम के पत्र से कुछ गंभीर हो चली थी, राम के पत्र ने उस गंभीरता का गला घोंट कर उसे हँसते-हँसते लोट-पोट कर दिया | उसने यह ठान लिया कि चलो दोनों भाई को कुछ न कुछ प्रतिउत्तर तो देना ही चाहिए ताकि फिर से वह ऐसी हिमाकत न करे | मुझे नहीं पता था कि एक कॉलेज में पढने वाले लड़कों से हाई स्कूल में पढने वाली लड़की कहीं अधिक समझदार होती है|