Saturday, 22 March 2014

अथ पंकज पुराण: कहीं शाम ढले पंकज जी घर क्यूँ नहीं आते

       परीक्षा का मौसम सर पर है, इसीलिए पंकज जी काफी शाम गए कोचिंग से नहीं लौटते हैं | पढने में तो बचपन से ही होशियार रहे हैं पंकज जी | उनके घरवाले को उन पर पूरा भरोसा है - "पिंटू एक दिन जरूर कुछ न कुछ करेगा" | घर में उन्हें सब पिंटू ही बुलाता है | पापा के भरोसे को सही ठहराने के लिए ही शायद पंकज जी जोरों से भिरे हुए हैं | बचपन से दसवीं तक अपने क्लास में टॉप ही करते रहे हैं वो, और खास बात ये है कि इसके लिए कभी कोचिंग भी नहीं ली उन्होंने | जो हमेशा बिना किसी ट्यूशन के ही टॉप करता रहा हो, वह भी शहरी शिक्षा व्यवस्था के कुचक्र में फँस कर कोचिंग लेने पर मजबूर हो गया, वह भी शाम ढले तक |
      पढाई भी क्यों न करे पंकज जी, आखिर कितनी मेहनत से उनके पापा पैसा का बंदोबस्त करते हैं सबको पता है |  अब किसानी में कुछ रखा है क्या ? फिर भी वो तो मानो रेगिस्तान में भी दो बूँद जिंदगी के निकाल लाते हैं और अपने बच्चों को पिला देते हैं ताकि उसके जीवन में हरियाली हो सके |
      वो तो हमलोगों को उस दिन आभास हुआ था कि कहीं शाम ढले पंकज जी घर क्यूँ नहीं आते और कौन सी कोचिंग पकड़ रखी है उन्होंने | रात्त में जब एक दिन परचून की दुकान से हमलोग कुछ राशन लेने गए थे तो पंकज जी अपने मजाकिया अंदाज में दुकान वाले का मज़ाक उड़ाते हुए अपने हाथ की अगरबत्ती को, जो अभी ख़रीदा ही था, नचाते हुए गाने लगे थे 'ॐ जय जगदीश हरे - स्वामी जय जगदीश हरे' | ये मज़ाक उस दुकान वाले को हजम नहीं हुई थी | अगले ही दिन उस दुकान वाले ने शाम के समय उन्हें पकड़कर तीन बेल्ट खींच कर लगा दिया 'चटाक - चटाक - चटाक', - "साला लौंडीबाज कहीं का लड़की लेकर घूमता है हरामखोर" | मैंने जैसे ही उस सबको आते हुए देखा था पंकज जी को छोड़कर भाग गया सर पर पैर रखकर | पंकज जी तन कर खड़े हो गए कि 'क्या करेगा', सो पिटकर आ गए |
      घर पहुंचते ही हमलोगों ने पंकज जी का चेहरा 'लाल' देखा तो पूछा था उनसे - "कौन था हो पंकज जी ?" ..... "दुकानदार था"- उन्होंने धीमे स्वर में रूखा सा जवाब दिया | लेकिन हमलोगों को लगा कि उन्होंने "रंगदार था" कहा | हमलोग जोर से हँसने लगे थे - "ओ अच्छा इसीलिए मारा क्या ?" वो चुप रहे, आँख तरेरते हुए अपने घर की छिटकनी लगा ली |
      हमारा प्रश्न घाव पर मिर्च की छिड़काव की भांति हो गया था | हमें पता नहीं था कि हमारा प्रश्न मिर्च है | हम तो बस उत्सुक थे यह जानने के लिये कि उस दुकानवाले ने इन्हें - "लड़की लेकर घूमता है हरामखोर" क्यों कहा, बस | हमें ये पता ही नहीं था कि कभी - कभी हमारी अंध उत्सुकता दूसरों को क्लेशयुक्त भी कर सकती है | इसीलिए उत्सुकता, जिज्ञासा जैसे गुणों पर भी अति पर नियंत्रण रखना बेहद जरूरी है |
      हम अनुमान ही लगा सकते थे - 'कहीं वह किरण तो नहीं ?', 'तो मामला यहाँ तक पहुँच गया और हमलोगों को भनक तक नहीं लगी' 'पंकज जी का शाम वाला कोचिंग शायद किरण के साथ घूमना-फिरना ही है' | इस तरह के भांति-भांति के विचार हमारे मन मस्तिष्क पर हथौडा मारने लगा | लेकिन ये सिर्फ अनुमान ही था तब तक, जब तक कि पंकज जी स्वीकृति की मुहर इस पर न लग जाती |   
      कुछ दिनों तक पंकज जी ने हमलोगों से बात तक नहीं की और हमारी जिज्ञासाओं पर तुषारापात करते रहे | लेकिन अपने हँसमुख व्यक्तित्व को वे आखिर कितने दिनों तक दबा कर रख सकते थे भला | ये हमलोगों को अच्छी तरह पता था कि वे अपने साथियों, अपने मित्रों से नजदीक में रहकर भी दूर नहीं रह सकते हैं | इस घटना के तीसरे ही दिन वो मेरे कमरे में हँसते हुए आए - "भाई साब थोड़ा अपना गैस दीजिये न, मेरा समाप्त हो गया है, दूध गरम करना है" | तीन दिनों के बाद पंकज जी को मुझसे मुख़ातिब होते देखकर मेरे होंठ भी फ़ैल गए - "हाँ हाँ पंकज जी आपका ही है, आप ऐसे ही हमें दर्शन लाभ देते रहें, भगवान करे कल आपका नमक समाप्त हो जाय, परसों हल्दी, चौथे दिन धनिया ....."
        वे मेरी ठिठोली भांप गए और इस प्रकार उनके तीन दिनों के मौनव्रत की हैप्पी ऐंडिंग हुई | मैंने उनसे फिर कभी नहीं पूछा कि पंकज जी उस दिन क्या हुआ था, बल्कि उन्होंने खुद ही बताया था | वास्तव में पंकज जी हमसे कुछ भी गुप्त नहीं रखते थे और दिन से शाम तक की घटनाओं का वृत्तांत रात में हमारी बैठक के समय बताया करते थे, खास कर मुझसे | मुझमे दूसरों की गुप्त और अंतरंग बातों को जानने की अंध उत्कंठा का जन्म वास्तव में इसी कारण से हुआ है | 
    पंकज जी उस दिन भी सारी बातें बता देते लेकिन उनकी पीड़ा को हमारी हंसी ने तीव्र कर दिया था उस दिन |
    "अरे उस दिन आरती नहीं उतारे थे दुकान वाले का इसी से गुस्सा गया था वो, साला छोटका       जात मजाक भी नहीं समझता" |
    "लेकिन इसके लिए वो आपको मारेगा क्या ... हमलोग सुगीत भैया से कहेंगे पंकज जी"
    "कौन सुगीत भैया ?"
    "अरे वो जो गैस सिलेंडर का दुकान करते हैं, वो लोकल हैं न, उस साले दुकानवाले को मजा       चखायेंगे"
      वास्तव में पंकज जी से हमारी हमदर्दी तो थी, दिल से थी, लेकिन हमदर्दी का बयान कर हम उनसे ये राज निकलवाना चाहते थे कि आखिर उस दुकानवाले ने इन्हें "लड़की लेकर घूमता है क्यों कहा" | अगले ही दिन मैं, राजा और पंकज जी गैस सिलेंडर लेकर सुगीत भैया के पास गए और सारी घटना ब्यौरेवार उनके सामने रखी गई |
      सुगीत भैया का हनुमान मंदिर के बगल से जो एक पतली गली गई है, वहीँ घर था | दिखने में छह फुट्टा काले कलूटे नौजवान, हँसते तो उजला- उजला पंक्तिबद्ध दांत ऐसे चमक उठता जैसे काले बादल में बिजली चमक उठी हो |
      पूरी घटना सुनने के बाद उन्होंने जोरो से सांस खींचा तो हमलोगों को यही लगा कि वे उस परचून वाले को बुला कर डाटेंगे, लेकिन नहीं, वे तो बस नेताजी टाईप आश्वासन देकर भारत- पाकिस्तान वार्ता ही विफल कर दी | सामने में तो नहीं लेकिन वहाँ से निकलकर पंकज जी ने सुगीत भैया को पेटभर गाली पढ़ी - "कमीना कहीं का सब छोटका जात साला ....." | मैंने भी उनके सुर में सुर मिलाया और मिलाते भी क्यों नहीं 'वफ़ा जिनसे की बेवफ़ा हो गए वाली बात हो गई थी मेरे साथ' | हमलोगों ने संयुक्त निर्णय लिया - "चूँकि सुगीत भैया ने कोई मदद नहीं की हमलोगों की इसीलिए उनके दुकान से गैस भरवाना बंद" |
      छोड़िये पंकज जी अब से ज्यादा शाम तक घर से बाहर मत रहियेगा, किसी से लेना - देना मत रखिये, न उधो का लेना - न माधो का देना, बेकार के झंझट में पड़ते हैं आप | पंकज जी भांप गए थे हमारी आतुरता को, मुस्कुराने लगे- "शाम में बतायेंगे माजरा क्या है" |
      दोपहर का समय था, सोच रहा था कि कैसे दिन के पर निकल आए या हमारा वश चलता तो पृथ्वी की घूर्णन गति ही बढ़ा देता, लगभग ऐसे अधीर थे हमलोग पंकज जी का माजरा जानने के लिए | लेकिन ये तो सब जानते हैं इतंजार की घड़ी मौत की घड़ी से कड़ी होती है | मैं अपने कमरे में बैठा था | राजा ने तो उस दिन शाम का खाना बनाना भी त्याग दिया कि कहीं लैला- मजनू की कहानी सुनने से वंचित न रह जाए और वह भी खुद मजनू की जुबानी | और उधर पंकज जी के नये भराए गैस पर दूध उबल गया था बहुत जल्दी, शायद वह भी अधीर था आज, इसीलिए अपना कार्य जल्द से जल्द निबटा लेना चाह रहा था ताकि चैन से बैठकर श्रृंगार रस का आनंद ले सके |
      जब आपकी किसी से मिलने की छटपटाहट होती है, आप बहुत व्यग्र होते हैं और आप बस मिलने ही वाले होते हैं उससे, तो कभी-कभी नियति को यह मंजूर नहीं होता और वायु का एक तीव्र झंझा आपके मिलन को नाकाम कर देता है |
      कुछ ही देर पीछे बाबा (मकान मालिक) को 'पंकज - पंकज' पुकारते हुए पंकज जी के कमरे में जाते हुए देखा था | कान खड़े हो गए हमारे लेकिन सुन नहीं सके हमलोग कि क्या कहा उन्होंने पंकज जी को | कुछ ही देर बाद पंकज जी अपना आधा लीटर दूध से भरा हुआ बर्तन लेकर आए - "हम जा रहे हैं घर"
      "क्यों क्या हुआ अचानक" - विस्मय होकर हमलोगों ने एक ही साथ पूछा |
      "घर से फोन आया था बाबा को .... दादी ख़तम हो गई"
हमलोग तो सन्न रह गए ये सुनकर | ये अलग बात है कि दादी बूढ़ी थी लेकिन मरने वाली तो कतई नहीं थी अभी |
     "सात बजे वाली ट्रेन पकड़ लीजिये लेकिन वहाँ पहुँचते-पहुँचते तो नौ बज जायेगा, अभी ही फोन कर दीजिये स्टेशन पर से तो कोई आ जायेगा नौ बजे उगना हाल्ट पर लेने के लिए"
      "हाँ देखते हैं जो गाड़ी पहले मिल जायेगी उसी से निकल जायेंगे"

     पंकज जी चले गए तो हमारी शामें उदास हो गई, मानों किसी की मांग उजड़ गई हो | किरण मायूस हो गई, उसे तो पता भी नहीं कि पंकज जी अचानक कहाँ गायब हो गए | मुझे पक्का विश्वास है कि उसका पढने में मन तो कतई नहीं रमता होगा | फुदकना बंद हो गया और हमेशा रेलिंग के सहारे कुर्सी टिकाकर बैठी रहती, इस आशा में कि खुल जा सिमसिम की तरह वह भी कहेगी - "खुल जा पंकज जी की खिड़की" और खिड़की हौले-हौले धीरे-धीरे .........
                                                                    

Monday, 3 February 2014

अथ पंकज पुराण - (राम-श्याम-किरण- 2)

(कहानी में तारतम्यता बनाए रखने के लिए कृपया सर्वप्रथम "राम-श्याम किरण-1" पढ़े http://vivekmadhuban.blogspot.in/2013/12/1.html
       राम-श्याम का घर फिल्ड के बगल में ही था और वहीं किरण का भी घर था, इसीलिए दिन में चार पाँच बार तो दोनों भाई को चंद्रमुख का नियमित दर्शन लाभ मिल ही जाया करता था | किरण किसी भी काम से घर से निकलती बालकोनी में या फिर नीचे लाउन में, जैसे दिन में फुल चुनना और शाम में क्रिकेट देखना तो नित्य कर्म में ही शामिल था, तो दोनों भाई आत्ममुग्ध होकर यही सोचता कि वह मेरे लिए ही निकलती है |
       किरण इन सब बातों से अनभिज्ञ थी कि कोई सरे आम उसके रूप से लवण प्राप्त कर रहा है और ये वो लोग हैं जो उसके भाई के मित्र हैं तथा जिसे वो भी भाई ही समझती है | राम-श्याम जब भी किरण के घर जाता किसी काम से (कार्य जानबूझकर और जबरदस्ती पैदा किया जाता था ताकि ‘उससे’ कुछ बात हो जाए) और गेट खटखटाने पर यदि किरण निकलती तो वह उसे ‘भैया’ ही संबोधन करती | किरण को इस बात का अहसास तब भी नहीं हुआ जब वह साईकिल लेकर ट्यूशन निकलती है तो छोटा भाई श्याम भी उसी समय निकलता है और जबकि उसका कोचिंग कहीं दूसरी तरफ है तत्पश्चात भी वह पीछे – पीछे कुछ फासला बनाकर प्रतिदिन जाता है | बड़ा भाई राम भी ठीक उसी समय प्रतिदिन अपनी खिड़की खोले जोकि किरण की ग्रिल के बिल्कुल सामने था, बैठा रहता है, हाथ में एक किताब लेकर और ग्रिल पर नजरे जमाए |
       वैसे तो न राम को श्याम के बारे में कोई शक था और न श्याम अपने भैया को प्रतिस्पर्धी समझता था | दोनों को एक दूसरे की हकीकत का पता कभी नहीं चल पाया क्योंकि दोनों में से किसी को भी किरण ने हरी झंडी नहीं दिखाई |
       किरण को सर्वप्रथम श्याम ने लाल रंग के बंद लिफ़ाफ़े पर सुगंधित इत्र छिड़क कर अपनी प्रेम-पत्र दिया | किरण समझ ही नही सकी कि श्याम भैया ये क्या दे रहे हैं |
       “इसमें क्या है भैया ?”
       “इसे बाद में पढ़ लेना” – इतना कहकर श्याम अपनी साईकिल को रफ़्तार देकर उस दिन आगे निकल गया था, कुछ संकोचवश, कुछ लज्जावश और कुछ भयवश, आखिर पहला प्रेम-पत्र जो था उसका |
“किरण कुमारी
मैं इंटरमीडियेट कॉमर्स का छात्र हूँ श्याम| मुझे क्रिकेटर बनना है | बैटिंग, बॉलिंग और कीपिंग तीनों कर लेता हूँ ये तो तुमको पता ही है क्योंकि तुम बालकोनी से देखती रहती हो मेरा मैच | हमारा खेल तुमको कैसा लगता है | अच्छा लगे तो ताली बजाना कभी-कभी | तुम बहुत अच्छी हो | मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ | ये बात किसी को मत बताना, हमको बहुत डर लगता है|
                                                             तुम्हारा अपना
                                                          श्याम कुमार मिश्र (कन्हैया)”

      किरण अवाक रह गई वह पत्र-पढ़कर | कुछ देर के लिए मन में एक गुदगुदी हुई थी लेकिन जिसे हमेशा से भैया कहती आ रही है उससे आखिर ये वाला प्यार कैसे हो सकता है भला और श्याम भैया कोई इतने स्मार्ट भी नहीं हैं कि लड़कियाँ उनकी तरफ स्वतः आकर्षित हो जाय | किरण गंभीर हो गई थी वह पत्र पढ़कर, लेकिन मात्र कुछ दिनों के लिए ही, जब तक कि श्याम कुमार मिश्र उर्फ़ कन्हैया का बड़ा भाई राम कुमार मिश्र ने भी एक प्रेम-पत्र नहीं थमाया था किरण को|
      श्याम के इस प्रेम-पत्र प्रसंग के दो तीन बाद ही श्याम अपने गाँव चला गया था कुछ दिनों के लिए| दादी की तबीयत खराब थी इसीलिए एक का जाना आवश्यक हो गया था | राम ने उचित अवसर जानकार बिना लिफ़ाफ़े के बिना लकीर वाले सादे पन्ने पर अपना प्रेम आवेदन प्रस्तुत किया था किरण को | राम तो बड़ा शर्मीला बंदा निकला, पत्र देकर अपने भाई की तरह खड़ा भी नहीं रहा कुछ देर और न किरण को कुछ पूछने का ही मौका दिया, बल्कि सीधे कट लिया वह से |
“किरण जी हम आपको बहुत चाहते हैं जब से पहली बार देखें है तब से ही | हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना | आपके पत्र के इन्तजार में आपका प्रेमी राम |”
      किरण, जो श्याम के पत्र से कुछ गंभीर हो चली थी, राम के पत्र ने उस गंभीरता का गला घोंट कर उसे हँसते-हँसते लोट-पोट कर दिया | उसने यह ठान लिया कि चलो दोनों भाई को कुछ न कुछ प्रतिउत्तर तो देना ही चाहिए ताकि फिर से वह ऐसी हिमाकत न करे | मुझे नहीं पता था कि एक कॉलेज में पढने वाले लड़कों से हाई स्कूल में पढने वाली लड़की कहीं अधिक समझदार होती है|