Sunday, 30 October 2011

सपने

सपने, केवल सपने नहीं होते
दृश्यमान ही केवल अपने नहीं होते.
सपने ;सोते जगते सपने, 
कभी- कभी हैं खुद ही आते 
किन्तु कभी खुद बुने जाते.
मीठे सपनों का आकर्षण 
बुनता है मन - अन्तःचेतन.
दुर्भाग्य है ये हम सपनों को 
केवल सपने ही कहते हैं 
चंचल मन चाहत करती है
पर  विरह-वेदना सहते हैं .
हम तो कहते हैं सपनों को
बस पाने की चाहत केवल 
है किये नहीं कोशिश ही कभी 
इतना भी नहीं हम में संबल,
और बरबस कहते रहते हैं
सपने तो सपने होते हैं.
सबसे बुरा होता है किन्तु,
कुछ अरमां लिए गुजर जाना,
पर होता है उससे भी  बुरा 
किसी के सपनों का मर जाना.
हमें कोशिश ये करनी है
किसी के सपने न मरे,
जिसे सोते -जगते सब ने  
सजाये अपने पलकों तले. 



Tuesday, 13 September 2011

सूखी हुई लीक

मासूमियत भरे चेहरे पर
दो बड़ी-बड़ी आँखें,
आँखों में आसूओं  की बूंदें 
पलकों का बांध तोड़कर
धीरे-धीरे सरकती है,
और पीछे छोड़ जाती है
गालों पर सूखी हुई लीक.

यह लीक, हरवक्त दिलाती है याद,
अपने परिवार के बचपन में हुई हत्या की
तथा अपने बचपन के हत्या की.
यह लीक, दिलाती है याद,
अपने बचपन को लावारिश बन जाने की
तथा लावारिश बीते अपने बचपन की.
यह लीक, याद कराती है,
उस हिंसक भरे वातावरण की
तथा वातावरण को हिंसक बना देने वालों की, 
जिसके लिए कोई भेदक रेखा नहीं थी -
अमीरी - गरीबी के बीच,
बच्चे, बूढों और जवानों के बीच,
पुरुषो और महिलाओं के बीच,
और यहाँ तक की -
जिन्दा और मुर्दा के बीच ;
और टूटकर बिखर गया
बचे हुए बच्चो का बचपन,
घुटकर रह गया
युवकों के अरमानों का गला,
बचे हुए बूढों का
स्वप्न भी हो गया धूमिल :
सुखी हुई लीक, बार-बार पूछती है प्रश्न -
लम्बे ऊँचे उड़ान में कैसे होंगे सहायक,
हमारे कुचले हुए पंख,
जिसमें वेदना है असंख्य. 


Tuesday, 6 September 2011

विश्वास

मत रोको मुझे उड़ने से 
मुझे आसमां की ऊचाई का अहसास है,
तुम्हें क्या होता है क्या पता?
मुझे अपने पंख पर विश्वास है.

आशा अंबर को छूने की से मुग्ध हूँ,
मत तोड़ हौसला सुन-सुनकर मैं क्षुब्ध हूँ,
मुझमे तुझमे अंतर बस इतना छोटा है,
तुम अचरजता में जिसको कहते हो 'अनंत' 
मैं थिर भावों से कहता हूँ 'आकाश' है.

डैना टूटे, टूटे चप्पू उत्कर्ष  में,
निकले ऊर्जा सारा चाहे संघर्ष में,
मुझमे तुझमे वैसा ही अंतर फिर निकला, 
लम्बी सांसों को खीच कहे तुम 'मील-दूर',
होठों पर मुस्की  पाल कहूं  मैं 'पास है'.
मुझे अपने पंख पर विश्वास है.

Wednesday, 31 August 2011

बचपन के दिन याद है

खेला करते छुपन-छुपाई
छुप जाता कहीं कोने में ,
खेल हुआ कब बंद क्या पता ?
खेल बीतता सोने में,
काश लौट जाते उस क्षण में
 ईश्वर से फरियाद है,
वह मौजूंपन वह अल्हरपन
बचपन के दिन याद है .

क्या होता है भूख, पता है ?
पता नहीं चल पाता था,
जब-जब होती जीत हमारी
तब शरीर बल पाता था,
न कोई राजा न कोई रानी
बस केवल बारात है,

वह मौजूंपन वह अल्हरपन
बचपन के दिन याद है .

खेल - खेल में होती कुट्टी 
वह तुनक - तुनक दोषारोपण ,
समय आ गया खेल का जब 
वह पुलक -पुलक बंधन टूटन,
पुलक उठा हु याद हुए  जब
पुलकन के संवाद है ,
वह मौजूंपन वह अल्हरपन
बचपन के दिन याद है .

विहगों की चहकन के पीछे
भी विहगा बन जाते थे,
नभ में न उड़ने के दुख को
भूल बहुत सुख पाते थे,
मिट्टी के घर हुए तो क्या है
सारा घर आबाद है,

वह मौजूंपन वह अल्हरपन
बचपन के दिन याद है .


लोड़ी माँ की बड़ी सुरीली
मुझे सुलाया जाता था,
मैं माँ की गोदी का राजा
मुझे झुलाया जाता था,
पता नहीं होता था मुझको
क्या पंचम क्या नाद है,

वह मौजूंपन वह अल्हरपन
बचपन के दिन याद है .



Sunday, 28 August 2011

वाह-वाह भ्रष्टाचारियों

भ्रस्टाचार रूपी नौका पर सवार
सफेदपोशों की काली करतूत
करती है विकास को अवरुद्ध ,
डालती है सामाजिक प्रगति में बाधा 
रूढ़ परम्पराओं का समर्थन कर 
जिसने अपना हित साधा .

घुन बनकर प्रशाषण की निष्पक्षता से
जनता के विश्वास  की जड़ों को
करती है खोखला,
बनाती जाती है प्रशाषण को भ्रस्टाचार का घोसला,
क़ानूनी शाषण की जड़ों को
करता है कमजोड,
अजीब विडम्बना है जनता इन्ही के हाथों मजबूर,
नियमों के साथ करता है खिलवाड़ 
उसे तोड़ता-मरोड़ता है,
देश का धन स्पंज की तरह चूसकर
स्विस बैंक में निचोड़ता है.
हतोत्साहित करता है पूंजी निवेश को
संक्रामक की तरह कब्जाती जा रही है देश को.
काले बाजार की अर्थव्यवस्था पनपाता है
राष्ट्रीय हितों की राह में रोड़े अटकाता है.
बूट से ठोकर मारकर मारकर हटाने वाला 
कोई नहीं है,
बिमाड़ी है संक्रामक
सब इसकी चपेट में आता जाता है.
राष्ट्रीय सुरक्षा की नीव में
लगाता जा रहा है पलीता,
वही सफेदपोश अपनी काली जुबान से
कभी लिया था शपथ
काले हाथों से पकड़कर गीता,
सफेदी से पुता हुआ काली करतूत
देश को कर रहा है बर्बाद,
आम जनता मौत के मुंह तक
हो गई है तबाह,
वाह-वाह देश के भ्रष्टाचारियों वाह।

Saturday, 27 August 2011

भिन्नता

पावस की तीव्र उमस में,
भूली भटकी वायु की एक गुच्छ ने,
खिरकी से घर में कदम रखा,
ईस्वर को धन्यवाद् दे हमने ,
उसे सर आखों पर बिठा लिया,
नाक ही क्यों,
रोम रोम से उसे चूसा लिया.
यही क्रिया दुबारा शरद में हुई,
रोम कम्पित हो उठा ,
और मैं बना छुई -मुई,
ईस्वर को कोष मैंने,
झट रजाई खीच लिया,
बदन को ढक कर मैंने,
मुट्ठी को भी भीच लिया.