Saturday, 21 December 2013

अथ पंकज पुराण - (राम-श्याम-किरण) - 1

        हमारी खिड़की के बाहर का जो क्रिकेट मैच हुआ करता था बड़ा ही रोमांचकारी | हरेक उम्र के खिलाड़ी, छोटा सा फिल्ड, नए-नए नियम जो प्रायः प्रतिदिन बदलते रहते और उसके दर्शकगण जोकि खिलाड़ियों के पारिवारिक कुटुंब ही थे, के कारण मैच का रोमांच चरम स्तर का चुम्बन करने लगता | हाँ, उस क्रिकेट की खास बातों में से एक यह भी थी कि उसमे किसी अम्पायर की व्यवस्था नहीं थी | कारण, आरंभ में तो इसकी व्यवस्था की गई थी लेकिन अंपायर मैच को रोमांचक बनाने का हिस्सेदार बनने के लिए खुद भी खेलने की जिद करने लगता था, अंततः अंपायर व्यवस्था को ही रद्द कर दिया गया | इस खेल का एक और नियम था कि विपक्षी टीम के खिलाड़ी को भी अपनी टीम की बैटिंग के समय फील्डिंग करनी पड़ती थी, हालाँकि यह नियम कुछ लचीला था, गोया कि खिलाड़ियों की संख्या ज्यादा हो जाती तो यह नियम लागू नहीं होता |
        हमलोग अपनी खिड़की से क्रिकेट का दर्शक बनते और किरण अपनी बालकोनी से | किरण के दर्शक बनते ही कॉलोनी में नए-नए खिलाड़ी पैदा होने लगे थे | खिलाड़ी की संख्या इसीलिए भी बढ़ने लगी क्योंकि अब दूसरे कॉलोनी के लड़कों के लिए भी यहाँ का अनुशाषित फिल्ड, यहाँ के प्रतिदिन परिवर्तनकारी नियम और यहाँ के देवलोक साम्य दैदीप्यमान दर्शकगण आकर्षण का कारण बन गए थे |
        किरण के भाई को छोड़कर सारे खिलाड़ी अपनी-अपनी भूमिका का निर्वहण करने में पूरी जान लगा देते, जिससे कि किरण की नजर का सुगन्धित झोंका उस पर भी पड़े | बल्लेबाज ताबड़तोड़ रन बनाने की कोशिश करता – ये गई गेंद बाउंड्री लाईन से बाहर और आऊट (यहाँ का नियम ही यही था)- और बॉलर पिछवाड़े से जोर लगा कर गेंद फेंकता जैसे कि साक्षात शोएब अख्तर हों |
        किरण को इस बात की ओर तनिक भी ध्यान नहीं था कि खिलाड़ियों की भीड़ अचानक से क्यों बढ़ने लगी है | वास्तव में वह भले ही शारीरिक रूप से बालकोनी से मैच देख रही हो लेकिन मानसिक रूप से वह पंकज जी की खिड़की से होकर उसके कमरे में पहुँच गई होती थी |
       कॉलोनी के ही कुछ लड़के जो किरण को कॉलोनी की अमानत समझते थे यह सोचकर खासे बेचैन रहते कि यदि दूसरी कॉलोनी से इन उच्चवर्गीय खिलाड़ियों का यूँ ही आयत होता रहा तो हो न हो इस कॉलोनी की अमानत को कोई और उड़ा ले जाएगा और हमलोग हाथ मलते रह जायेंगे| अमानत के इन तथाकथित पहरेदारों के चेहरे पर फ्यूज उड़न भाव कभी-कभी स्पष्ट दृष्टिगोचर होता था |
        कॉलोनी मे वहीँ फिल्ड के बगल में एक जुड़वा भाई रहता था- राम और श्याम | दोनों ग्रैजुएशन का छात्र था, उस कॉलोनी क्रिकेट का पुराना और जिम्मेदार सदस्य तथा साथ ही जुझारू खिलाड़ी भी था | शक्ल-सूरत से लेकर सीरत तक दोनों की बिलकुल ही एक जैसी थी | हमलोगों की ज्यादा बातचीत नहीं हुई थी उससे आरंभ में इसीलिए क्रिकेट खिलाड़ी के तौर पर हमलोग दोनों को उसकी हँसने की अलग-अलग शैली से ही भिन्न-भिन्न कर पाते थे | राम, बड़ा भाई जब हँसता तो उसके मुँह के सारे दांत बाहर निकलने के लिए बेताब होने लगते जबकि श्याम हँसने के समय होठों को दबाने की असफल कोशिश करता और उसके बायें गाल पर एक डिम्पल भी उभर आता |
        दोनों भाई चूँकि कुछ सालों से वहीं रह रहे थे इसीलिए अब स्वंय को उस कॉलोनी का ही सदस्य समझने लगे थे | अतः “कॉलोनी में कोई असामाजिक कृत्य नहीं होने देने का सारा क्षार-भार अपने कंधों पर उठाये फिरते थे” वे दोनों | उनकी स्थिति कुछ-कुछ वैसी ही थी जैसे एक मुहल्ले  के आवारा कुत्ते अपने मुहल्ले में भोज होने पर दूसरे मुहल्ले के आवारा कुत्तों को पास फटकने नहीं देते |
         वहाँ जैसे है खिलाड़ियों का आयत होने लगा दोनों भाईयों की श्वान नासिका ने खतरों को सूंघ लिया | कॉलोनी क्रिकेट निर्माता खिलाड़ियों के बीच अब यह नियम बनाने का मुद्दा जोर शोर से उठाया जाने लगा कि केवल अपनी कॉलोनी के खिलाड़ी ही उस क्रिकेट में शामिल हो सकते हैं | लेकिन इस नियम के बनने से पडोसी कॉलोनी से संबंध बिगड़ने का डर था इसीलिए यह नियम बनाना तलवार की धार पर चलने जैसा था और अधिकांश अपनी मित्रता को भी यथावत रखना चाहते थे इसलिए यह नियम पारित नहीं हो सका |

        राम-श्याम की भी हालाँकि दूसरे कॉलोनी वालों से मित्रता थी, लेकिन वो दोनों नहीं चाहते थे कि बाहर से आये लड़के क्रिकेट खेलने के अतिरिक्त ध्यान दर्शकों पर लगाए, विशेषकर किरण के मुखकमल का रसपान करे | क्योंकि, दोनों भाई प्यार करते थे किरण से और वो भी एकतरफा वाला प्यार | दोनों का प्यार ‘गोदान’ की ‘मालती’ के लिए ‘मेहता’ का प्यार था, एक खूंखार शेर जो अपनी शिकार पर किसी की नजर नहीं पड़ने देता | खास बात ये थी कि चूँकि दोनों सहोदर भाई थे और अभी छात्र जीवन में ही गमन कर रहे थे इसीलिए अपने एकतरफा प्रेम-प्रसंग का पर्दाफास एक दूसरे के समक्ष करने से घबराते थे, या ये कहूँ कि डरते थे तो अधिक युक्तिसंगत होगा |  
                                                                     ........ क्रमशः 

Monday, 9 December 2013

अथ पंकज पुराण : "प्रेम गली से हाइवे तक" (2)

        पंकज जी ने फटाक से दरवाजा बंद कर लिया और यहाँ तक कि उस दिन खोला ही नहीं | अगले दिन जब पंकज जी के समक्ष यही प्रसंग पुनः खोदा गया तो वो मुस्कुरा भर दिए | उन्होंने फिर खुद ही बताया कि किरण ने ग्याहरवीं में नवोदय छोड़कर दरभंगा में ही रहने का फैसला किया है - 
"यहाँ मेडिकल की अच्छी तैयारी होती है न इसीलिए, स्कूल के साथ - साथ मेडिकल की भी तैयारी करेगी" | "आपने कहा था क्या पंकज जी, यहीं पर रहो दरभंगा में ही" 
"हाँ मैंने एक बार ये तो कहा था कि नवोदय जहाँ पर है वहाँ तो मेडिकल की कोचिंग भी नहीं है, इस पर खुद उसी ने कहा कि ग्यारहवीं में यहीं रहूँगी"
"चिंता नहीं करने का पंकज जी हमलोग किसी को नहीं बताएँगे और कभी कुछ मदद की जरूरत हो तो हमलोग हैं ही यहाँ पर, मतलब नो चिंता नो फिकर"
        पंकज जी को हमारी मित्रता की वफादारी पर कोई शक नहीं था | वो जानते थे कि हमलोग उनके इस नव अंकुरित प्रेम प्रसंग का ढ़ोल पीटकर उस पर पाला नहीं पड़ने देंगे | इसीलिए वो आश्वस्त होकर इस पौधे को वटवृक्ष बनाने के लिए नियमित रूप से सिंचाई कार्य में जुट गए |         
        ग्रेजुएशन में नया-नया एडमिशन ही लिया था और कॉलेज तो रामभरोसे ही चलता था इसीलिए शुरूआती कुछ सप्ताह के बाद कॉलेज जाना लगभग परमानेंट ही बंद कर दिया पंकज जी ने | दरभंगा जैसे छोटे शहरों में भी प्रोफेसर और टीचर कॉलेज में क्लास इसीलिए भी नहीं लेते थे ताकि छात्रों की भीड़ उनके कोचिंग संस्थानों में इकट्ठी हो और वह अपनी नियत सैलरी के अलावा भी छात्रों से धन बटोर सके | विशेषकर विज्ञानं के छात्रों के समक्ष कोचिंग पढने की मजबूरी हो जाती थी और प्रायः सभी छात्र कोचिंग व्यवस्था के इस मकरजाल में उलझ ही जाता था | 
        पंकज जी भी उसी समय कोचिंग जाते जिस समय किरण स्कूल जाती और सारा कोचिंग शाम तक समाप्त कर दोनों साथ ही आते | लेकिन, दोनों का साथ घर से कुछ आगे जो हनुमान मंदिर था वहाँ से आरंभ होता और वहीँ पर ख़तम ताकि कॉलोनी वालों तक इस खिचड़ी की गंध न पहुँचे |  ये जिन्दगी हनुमान मंदिर से शुरू हनुमान मंदिर पर ख़तम टाइप की स्थिति थी दोनों की | 
        पंकज जी की यह यात्रा बदस्तूर और लगातार जारी रही कल -कल करती नदी की उच्छृंखल धार की तरह | इसके सामने आने वाली छोटी- छोटी स्कूल की छुट्टीनुमा रुकावटें भी बहती चली गई | जब स्कूल में छुट्टी होती  तो किरण यह बहाना करती घर में कि "मम्मी आज एक घंटा पहले से ही कोचिंग होगा, स्कूल में छुट्टी हैं न इसीलिए" | पंकज जी की जब कोचिंग में छुट्टी होती तो वह भी नियत समय पर हनुमान मंदिर से किरण के स्कूल तक की यात्रा के लिए निकलना न भूलते गोया कि तीर्थयात्रा कर रहे हों | 
        मुझे पता नहीं है, लेकिन बखूबी अंदाजा है कि शायद प्रेम करने वालों को एक दूसरे के साथ वक्त गुजारना काफी अच्छा लगता है | इसीलिए तो प्रेम की कसमें हमेशा साथ रहने, साथ जीने, साथ मरने की ही होती है अर्थात हर स्थिति में एक दूजे के लिए बन कर साथ-साथ रहने की अटूट इच्छा चाहे स्थिति सुखद अथवा दुखद | 
        पंकज जी और किरण इस प्रेम-पथ पर आगे बढ़ चले थे और ईशारेबाजी से आरंभ कर छोटा-छोटा साथ की गली से गुजर रहे थे | दोनों की यही तमन्ना थी - कैसे छोटा को बड़ा किया जाय, गली से हाईवे पर पहुँचे और इसकी रफ़्तार जिन्दगी की रफ़्तार से घुल-मिल जाय | परस्पर साथ रहने की भावना का लोप हो जाय और उसके बदले हम साथ-साथ हैं के प्राप्य का समावेश हो जाय | अभी तो काफी लम्बा रास्ता तय करना था दोनों को, जहाँ रस्ते में कांटे भी हैं फूल भी, चन्दन भी हैं धूल भी और जाना है बड़ी दूर बटोही |

Sunday, 24 November 2013

अथ पंकज पुराण : "प्रेम गली से हाइवे तक" (1)

        आजकल पंकज जी का गेट अधिकांशतः बंद ही रहता है, कहते हैं कि पढाई का टेंसन हो गया है इसीलिए वो सीरियस रहते हैं और हमलोग उनके सीरियसपन को देखकर टेंसनाइज हो गए हैं |    
        मुझे क्या पता कि किरण छुट्टी में भी इतना सीरियस रहने वाली लड़की है | ग्यारहवीं में एडमिशन से पहले ही बुक लेकर अपनी बालकोनी में जमी रहती है | बिस्किट का रैपर फेंकने के लिए जैसे ही खिड़की खोला कि देखता हूँ किरण का नयन पंकज जी की खिड़की पर मासूम आघात कर रहा है | पहली बार पता चला कि पढाई भी संक्रामक रोग की तरह होती है लेकिन यहाँ ये नहीं पता कि किसका संक्रमण किसमे फैला है | 
        किसी भी संक्रमण का यथोचित समय में उपचार न किया जाय तो वह कैंसर का रूप पकड़ लेता है और पंकज जी पर हमारा कोई उपचार कारगर हो ही नहीं रहा था | हमलोगों ने कितना समझाया - प्यार के बीमार को उतार मेरे मनवा - लेकिन पंकज जी अपनी बीमारी से प्यार करते हैं और उन्हें बीमारी पैदा करने वाली से तो अटूट प्यार है | 
        "आप भी गजब करते हैं पंकज जी, राह चलते जिस लड़की को देखा आपको प्यार हो जाता है वो भी अटूट वाला प्यार" | पंकज जी जानते हैं हमलोग समीकरण समझ गए हैं लेकिन वो इश्क करते हैं मगर बताते भी नहीं और छुपाते भी नहीं - "अरे यार तुमलोग तो जानते हो मैं खिड़की पहले से ही खोल के रखता हूँ और मैंने थोड़े ही किसी को बालकोनी में बुलाया है, परीक्षा भी सर पर है तो अब से मटरगस्ती तो बंद करना ही पड़ेगा न"| हमलोग हथियार डाल जाते पंकज जी के इस डिफेंसिव स्ट्रोक पर क्योंकि पता है - वो झूठ नहीं बोलते भले ही हकीकत छुपा ले | 
        अब हमारी खुफिया टीम को पकड़ना था रंगे हाथों, पंकज जी को नयनों से नयनों का गोपन प्रिय सम्भाषण करते हुए | मैंने और राजा ने इस गुरुतर कार्य को सफल बनाने के लिए एक कार्ययोजना बनानी आरम्भ कर दी |
        मैं और राजा दोनों एक ही क्लास में पढ़ते थे, एक ही विषय पीसीएम के छात्र थे लेकिन स्कूल अलग-अलग था हम दोनों का | अपना अध्ययन कार्य छोड़कर दूसरों की गतिविधियों पर नजर रखना और अपनी खुफियागिरी के लिए खुद ही अपनी पीठ थपथपाना हमलोगों का फितूर बन गया था | दसवीं तक क्लास में मुझे ही मॉनिटर बनाया जाता था | क्लास में अनुशासन बनाये रखना और गैर-जिम्मेदाराना, असभ्य हरकत करने वालों पर नजर रखने की आदत शायद मेरे व्यक्तित्व में ही घर कर गई थी जो समय और स्थान परिवर्तन के बावजूद भी हमारे शरीर में अड्डा बनाये बैठा हुआ था | इसीलिए सारा काम पेंडिंग में डालकर दूसरों की गतिविधियों पर नजर रखने की छोटी से छोटी गुंजाईश होते ही हम पूरी मुस्तैदी से मॉनिटर बन जाते हैं, अभी भी | 
        जब हमारी यह छोटी खुफिया इकाई ने पंकज जी को रंगे हाथों पकड़ा था किरण का ईशारों-ईशारों में दिल लेते हुए तो हमने उन्हें कुछ नहीं कहा था उस समय बल्कि किरण के ईशारे की कॉपी - सेव कर ली थी दिमाग में और फिर जब उनका ईशारा-कांड समाप्त होने के बाद वही ईशारा मैंने उनपर पेस्ट करना चालू कर दिया था तो कैसे लाजवंती बन गए थे पंकज जी | चेहरे का भाव तो कॉलोनी के ही उस चोर की भांति हो गया था जो चोरी कर लेने के बाद भागते हुए पकड़ा जाता है - 
"हे हे हे हे अरे तुमलोग भी न, यार बहुत अच्छी है किरण नवोदय में पढ़ती है"- पंकज जी सफाई देने लगे | 
"अच्छा तो लगता है पूरा इतिहास भूगोल छान कर बैठे हैं साहब"
"इतिहास-भूगोल कुछ भी नहीं पता है मुझे, वो बराबर देख रही थी इधर तो मैंने पूछा था एक दिन बस"
"आपके 'इधर' ही क्यों मेरे 'इधर' क्यों नहीं पंकज जी, खैर छोडिये और ये बताइए कि सेटिंग कैसे करते हैं हो ?"
        पंकज जी चिढ़ से गए हमारे इस औत्सुक्य मिश्रित बेतुके सवाल पर और यह मुझे आज तक पता नहीं चला कि कोई प्रेमी इस वृत्तांत को क्यों नहीं शेयर करता है किसी से | अनुमान ही लगा सकता हूँ कि सच्चा प्रेमी यह राज कभी नहीं खोलते हैं शायद और जो इस वृत्तांत को चटकारे ले लेकर स्वंय को तीसमारखां दीखाना चाहते हैं वो निःसंदेह सच्चा प्रेमी नहीं हो सकता, उसके लिए तो प्रेम उम्र के एक विशेष पड़ाव पर मनोरंजन का सर्वजनदुर्लभ साधन ही हो सकता है मात्र  |   ....................... क्रमशः 
       
        

Friday, 8 November 2013

अथ पंकज पुराण: बुद्धिमान के लिए ईशारा काफी (2)

(कहानी में तारतम्यता बनाए रखने के लिए कृपया सर्वप्रथम - "बुद्धिमान के लिए ईशारा काफी (1)" पढ़ें http://vivekmadhuban.blogspot.in/2013/10/1_23.html )
        
        माँ उतर रही है धीरे - धीरे अपने सैंडिल से सीढियों को पुचकारते हुए | चाल और चेहरा दोनों में गर्व झलक रहा है | किरण दीवाल की ओट से निकल माँ के साथ हो लेती है और ग्रिल से बाहर निकलने लगती है | दोनों की पीठ पंकज जी की खिड़की की तरफ है | किरण की आँख ग्रिल की कुण्डी पर है और ध्यान पंकज जी की खिड़की पर | अपनी पीठ पर दो आँख गड़ी हुई महसूस कर रही है, मन में गुदगुदी होती है और गर्दन नत हो जाती है | 
        ग्रिल से बाहर निकल किरण ने कुण्डी लगाई और खिड़की की तरफ चोर नजरों से देखा एक बार, पंकज जी मैदान में डटे हुए हैं | पहली बार दोनों की आँखें चार हुई और इधर किरण पुनः गर्दन नत कर शर्मा आंटी के घर के लिए माँ के पीछे हो ली | पंकज जी दोनों हाथों से अपने हार्ट को दबाये खिड़की के नीचे दुबक गए | किसी लड़की से जब आँखों ही आँखों में बाते होती है तो मन पुलकित क्यों हो जाता है ? बातें न भी हो, मौन भी क्यों धड़कन बढ़ा देता है? अजीब विरोधाभास है- धड़कन बढ़ भी जाती है लेकिन हार्ट अटैक का खतरा तक नहीं होता | उत्तर - पता नहीं - पंकज जी अपने ही प्रश्न के आगे निरुत्तर थे | 
        शर्मा आंटी के घर पहुँचकर मम्मी ने कॉलबेल का स्विच दबाया, पाँच मिनट तक किसी ने भी कोई उत्तर नहीं दिया अन्दर एकदम सन्नाटा पसरा रहा | शायद बाहर स्विच तो था लेकिन अन्दर बेल ही ख़राब थी | ग्रिल की कुण्डी खटखटाई तो अन्दर से एक सुरीली आवाज जिसमें जानबूझकर भारीपन लाई गई थी - "कौन है, इतना जोर से खटखटा रहा है ग्रिल को, तोड़ ही दो इससे अच्छा" - शर्मा आंटी की आवाज थी ये - "अरे आप, आइये-आइये, आ जाओ किरण बेटी, ये पता नहीं कौन सब आ जाता हैं और जोर-जोर से पीटने लगता हैं, हथौरा चला रहे हों जैसे, बुरा मत मानियेगा"- शर्मा आंटी शर्मिंदा होकर कुछ दीन स्वर में बोली थी | किरण की माँ समझ रही थी इस बात को | उन्हें भी तक़रीबन प्रतिदिन इस तरह की मुसीबतों से दो-चार होना पड़ जाता था - "बुरा क्यों मानेंगे भला, हमारे ग्रिल को तो लोंगो ने पीट-पीट कर बदरंग बना दिया है, लेकिन अब तो कॉलबेल लगवा दी है मैंने फिर भी लोगों को दिखता ही नहीं" | "हाँ बहुत अच्छा किया, मैं तो इनसे कह-कहकर थक गई कॉलबेल ठीक करवाने के लिए पर ये मेरी सुनते ही कब हैं"- आंटी ने प्रतिउत्तर में कहा - "अच्छा एक मिनट बैठिये मैं चाय बना लाती हूँ" |
"रहने दीजिये चाय-वाय कुछ ही देर में चले जायेंगे इनका टेलीफोन आने वाला है"
"नहीं-नहीं बिना चाय-नाश्ता के नहीं जाने दूंगी मैं, ऐसे भी आप आती ही कब हैं और किरण बेटी भी आई है आज " - शर्मा आंटी इतना कह झटपट किचन में घुस गई |
        किरण को समय काटना पहाड़ सा लग रह है | सोच रही कि कितनी जल्दी यहाँ से उड़कर अपनी बालकोनी में चली जाती | मन ही मन आंटी को कोसती है - "शर्मा आंटी भी न कितना व्यवहारिक होने लगती है, चाय-नाश्ता तो सभी अपने घर से ही करके आते हैं" | किरण बहुत व्यग्र हो रही है, बार-बार घड़ी देख रही है, उठक-बैठक कर रही है किन्तु माँ और आंटी किरण के इस मानसिक उथल-पुथल से अनभिज्ञ कॉलोनी की सारी महिलाओं का कच्चा-चिट्ठा टी-टेबल पर फैलाती जा रही है |
        खैर जैसे-तैसे कॉन्फ्रेस समाप्त हुई और समय का घोडा लंगड़ाते ही सही वह फासला भी तय कर लिया जब किरण अपनी बालकोनी में कुर्सी लगाकर और हाथ में पुस्तक लेकर ऐसे ही जम गई जैसे खिड़की पर पंकज जी |
        ये तो हो गया भैया - फर्स्ट साईट लव वाला मामला | निष्कर्ष यही निकला कि किरण न केवल पढने में होशियार है बल्कि पद्मावत की नागमती की तरह "दुनिया-धंधा' में भी कम बुद्धिमान नहीं है | इसीलिए तो पंकज जी के आँख के इशारे को पलक झपकते ही आत्मसात कर लिया उसने | कहा भी गया है - बुद्धिमान के लिए ईशारा काफी | 

(आपका बहुमूल्य कमेन्ट हमारे लेखनी की जीवन-शक्ति है)

Wednesday, 23 October 2013

अथ पंकज पुराण: बुद्धिमान के लिए ईशारा काफी (1)

        "किरण को जो आप देख लो एक बार बिल्कुल्ले बदल गई गई है, शकल - सूरत से लेकर चाल-व्यवहार तक पहचाने में नहीं आती" - बगल वाली शर्मा आंटी अंकल से कह रही थी "नमस्ते भी किया इस बार, पहले तो कैसे अकड़ी रहती थी …लगता है नवोदय में अच्छी पढाई होती है तभी तो, हमारा दुनू में से एक का भी हो जाता, पढने में तो कितना तेज है हमारा दुनू बच्चा … पक्का किरण के पापा ने कोई जुगाड़ भिड़ाया होगा" । 
        सामने में भले ही तन-मन-धन अर्पण कर दें सभी लेकिन अमीर का बच्चा आवारागर्दी न करे, सभ्य और सुसंस्कृत हो जाए तो पता नहीं कॉलोनी वाले क्यों जलने लगते हैं और हरेक सफलता में षडयंत्र सूंघते हैं । 
        किरण को प्यार है, अटूट प्यार, अपने माँ - बाप से, अपने भाइयों से, अपने दोस्तों से, अपने स्कूल से, अपने घर से, घर की बालकोनी से तथा उन सभी से जिससे उसका जुडाव है, कुछ न कुछ संबंध है । 
        "हमारे घर तो कभी आप आती ही नहीं, कल आइये न और किरण को भी साथ लाइयेगा, जरूर से"- जाते हुए शर्मा आंटी ने कहा था तो बड़ी खुश हुई थी किरण । ऐसा किसी ने पहली बार कहा था -  "किरण को भी साथ लाइयेगा" । मन ही मन सोचती है किरण - "ए किरण ससुराल से आई है क्या रे, कि शर्मा आंटी ने ऐसा कहा - किरण को भी साथ लाइयेगा, जरुर से" । ससुराल से तो नहीं आए हैं लेकिन कभी न कभी तो आयेंगे ही- होठों पर एक मुस्कान तैर जाती किरण के, आवाज नहीं निकलती, मम्मी पूछ ले तो क्या कहेगी और अब चेहरा लाल हो गया किरण का, एकदम सिन्दूरी लाल, होठों को जोर से दबा कर मुस्काई अब वो । 
        वैसे सच तो यही है कि जब लडकियाँ घर से दूर पढने के लिए चली जाती है और एक सामान्य अंतराल पर भी आती है तो घर-परिवार से लेकर आस-पड़ोस वाले भी उसके चेहरे पर ससुराल की चमक खोजते फिरते हैं और ऐसा व्यव्हार, ऐसा प्यार जैसे सचमुच बेटी ससुराल से ही आई हो । 
        किरण आज अपनी माँ के साथ शर्मा आंटी के घर जा रही है । अपनी सीढ़ी से खटाक-खटाक उतर रही है । अभी भी थोड़ा बहुत बचपना है ही किरण में और हो भी क्यों नहीं अभी तो दसवीं की परीक्षा दी ही है उसने । बचपना तो उमर के साथ बढती ही जाती है क्योंकि बचपन में तो लोग अपनी स्वाभाविकता को जीते हैं जबकि बचपना का अभिनय तो बचपन बीत जाने के बाद ही किया जा सकता है । और किरण बचपना क्यों न करे, माँ का ममत्व उसे बचपन की और आकर्षित करता है तो उसकी ;उम्र उसे गंभीर रहने के लिए मजबूर करती है । बालपन और गंभीरता है सुन्दर समायोजन है किरण में । इसीलिए जब वो सीढ़ी से उतरती है तो सैंडिल पटकते हुए खटाक-खटाक-खटाक और जैसे ही खिड़की से पंकज से को अपनी तरफ देखते हुए पाती है, झंडे की तरह लहराता हुआ दुपट्टा व्यवस्थित कर, गर्दन झुका कर दीवाल की ओट में छिपकर माँ की प्रतीक्षा करने लगती है। माँ अभी तक नहीं उतरी है नीचे, कितनी देर से प्रतीक्षारत है किरण - "उफ्फ माँ भी न, बगल में जाना है फिर भी कितना मेकअप करने लगती है"। जब आप किसी की प्रतीक्षा करते हैं तो घड़ी की सुईयों की भी हवा निकल जाती  हैं ।
        पंकज जी खिड़की पर जमे हुए हैं - कब निकलेगी ओट से, एक बार और देखते, सही से देख ही नहीं पाया, पता ही नहीं था इसमें कोई लड़की भी रहती है । पंकज जी को लग रहा है - हो न हो दीवाल में कोई दरवाजा है जिससे अन्दर चली गई होगी लेकिन, उतरी तो छत से है तब नीचे के दरवाजे से ऊपर कैसे जा सकती है, बिना सीढ़ी के, नहीं-नहीं छुपी हुई है - पंकज जी अब भी जमे हुए हैं अपनी खिड़की पर ।   ………… क्रमशः 

Monday, 7 October 2013

अथ पंकज पुराण: क क क किरण (पार्ट -2)

        किरण को यह पहली बार उसी विद्यालय में पता चला कि लड़की - लड़के भी आपस में दोस्त हो सकते हैं, जैसे लड़की - लड़की या लड़का - लड़का | किरण को यह भी वहीं पता चला कि आँख मारना कभी - कभी ईशारा करना से भी आगे की बात होती है| यह आगे की बात का पता तब चलता है जब किसी खास के आँख का मारना किसी विशेष के हार्ट का एक्सीलेटर बन जाए | 
        किरण भी तो लड़की ही थी न, इसीलिए इस मामले में वो भी अंतर्मुखी थी | मन में गुदगुदाहट तो होती और अकेले में होठों पर थिरकने भी लगता, लेकिन अपनी असामाजिक भावनाओं को ताबूत में बंद रखना उसने भी सीख लिया था, वहीं पर |
        वास्तव में होता ये है कि जो विचार, जो भावना रूपी बीज हमारे अवचेतन मस्तिष्क में अरसों तक दबी रहती है, वो उचित समय, उचित मौसम में धरा का सीना फाड़कर अवश्य ही अंकुरित हो जाती है | जब ये पौधा एक बार अंकुरित हो जाय और उसे समय - समय पर नियमित रूप से पोषित किया जाने लगे तो फिर उस विचार की, उस भावना की फसल लहलहाने लगती है | हरियाली ही हरियाली चारों तरफ | 
        किरण पहले पहल तो दो दिनों की भी छुट्टी होने पर भाग कर दरभंगा आ जाती | लेकिन धीरे - धीरे उसका आकर्षण बढ़ता गया - पढाई के प्रति, वहाँ के माहौल के प्रति और उसके दरभंगा आने का अंतराल भी बढ़ता चला गया | होता है, ये भी होता है, जब हम किसी के प्रति आकर्षित हो जाते हैं तो सब कुछ आगे - पीछे भूल जाते हैं, उस समय तक के लिए जब तक कि उस आकर्षण की चमक फीकी न पड़ जाए | 
        किरण को अच्छा लगने लगा था विद्यालय का माहौल | कोई  शक नहीं वो पढने में होशियार थी, लेकिन उम्र के साथ होने वाले शारीरिक परिवर्तन ने उसके मानसिक परिवर्तन में हलचलें पैदा कर दी थी | जिन लड़कों से वह बात - बात पर चिढती, झगडती उसका सान्निध्य सुखद लगने लगा था उसे | सभी छात्र - छात्रा जब जुटते थे तो गाना - बजाना, डांस भी हो जाता - "इट्स अ टाईम टू डिस्को" |
        दसवीं की परीक्षा के बाद एक महीने की छुट्टी, हॉस्टल बंद तो दरभंगा आना ही था | कैसे रो रही थी किरण सभी से गले मिल - मिलकर | उसको रोता देख तो ऐसे ही लग रहा था - डोली चढ़ के किरण ससुराल चली | "ए किरण इतना क्यों रोती है रे, हमलोग एक महीने के बाद तो फिर मिलबे करेंगे, कोई हमेशा के लिए थोड़े ही न जा रहे हैं, अब चुप हो जाओ नहीं तो कुट्टी कर लेंगे" | किरण चुप हो गई, होंठ फ़ैल गया, आँसू के दो बूँद ढुलक कर उसके होठों को तर कर दिया, कुछ जीभ पर भी चला गया, मीठा - मीठा स्वाद था उसका | ये तो सबको पता है कि दुःख के आँसू नमकीन होते है और ख़ुशी के मीठे लेकिन दोनों की शक्लें एक ही तरह की होती है तो पहचानने में थोड़ी समस्या आ ही जाती है |
       किरण के दोस्तों को नहीं पता था कि जिसके बिछड़ने के गम में किरण इतना विरहिणी हो रही है, इतना आँसू बहा रही है, यह सब छुट्टी के बाद धरा का धरा रह जाएगा | वैसे ये किरण को भी कहाँ पता था कि वो सदा के लिए अब दरभंगा जा रही है | इन चार - पाँच सालों में दरभंगा बहुत प्यारा हो गया है | इसके लिए तो नवोदय क्या, सूर्योदय - चंद्रोदय सबको भुला दूँ | "आई लव यू दरभंगा" - अपनी बालकोनी से किरण ने कहा हौले से - चुपके से और पंकज जी इधर खिड़की में कान लगाये हुए फुसफुसाते हैं - "क क क किरण, तू है मेरी किरण", डिट्टो शाहरुख़ की तरह बोलते हैं पंकज जी | 

Thursday, 3 October 2013

अथ पंकज पुराण: क क क किरण (पार्ट -1)

         कोई पूछता नाम, नाम क्या है आपका? फ़िल्मी स्टाईल में वो बोलती "किरण, किरण भारद्वाज" | पंकज जी तो एकदम शाहरुख़ बन जाते "क क क किरण, वो है मेरी किरण" |
        कान्वेंट स्कूल की छात्रा, फर्राटेदार अंग्रेजी, ग्यारहवीं में बायलोजी, डॉक्टर बनने की चाहत, अपनी से ज्यादा मम्मी - पापा की | तीन भाइयों की अकेली, सबसे छोटी, लाडली बहन किरण |
        भाई नं 1 - मुंबई में किसी एमएनसी में इंजीनियर, विवाह योग्य उम्र | सब तो यही कहते कि शादी वादी सब कर धर के बैठा है, चूना लगा दिया बाप को | भाई नं 2 - केरल की किसी सरकारी कॉलेज में मेडिकल स्टूडेंट | दिखने में स्मार्ट, पहली बार मूंछ छिला कर आया तो कॉलोनी वाले कहते "नालायक है, बाप जिन्दा है और मूंछ छिला कर आया है शरम भी नहीं आती" | भाई नं 3 - पटना में लगातार तीन सालों से इंजीनियरिंग की तैयारी |  इस बार निकलने का चांस है, मम्मी - पापा को तो हरेक बार यहीं आश्वासन मिलता |
        पिता, फॉरेस्ट विभाग में रेंजर थे, रांची में | अकूत काला धन से दरभंगा का घर चमका रखा था | पायदान तक पर सफ़ेद मार्बल लगा रखा था, झक्क सफ़ेद, दूधिया और अहाते में कई तरह के फूल - अड़हुल, कनेर, गुलाब और एक जो छोटा - छोटा फूल होता है उजला - उजला, डंठल नारंगी, सुंगंधित, सुबह - सुबह जमीन पर ढेर बिखडा रहता है, वो भी था | 
        माँ, असाधारण सा दिखने की कोशिश करने वाली एक साधारण सी महिला थी | चेहरे पर अमीरी चमकता रहता और चलती तो चाल में एक गर्व झलकता | कॉलोनी के लड़के यदि दिन में चार बार भी देख ले तो - "आंटी नमस्ते - आंटी नमस्ते" कर आशीर्वाद लेते नहीं अघाते और आंटी भी भाव - विभोर हो जाती |
       बचपन में किरण पढने में बहुत होशियार थी | है तो अभी भी लेकिन अब बचपन बीत चुका है और वो विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होने वाले उमर में पहुँच चुकी है, परिणामस्वरूप उसकी होशियारी में भी विभाजन हो गया है |
        घर में सबसे छोटी और पैसा भरा पड़ा था घर में , अतः इनकी हरेक इच्छा जुबान से फिसली नहीं की पूरी हो जाती, नो खीच - खीच, नो टेंशन | इसीलिए स्वाभाव से थोड़ी जिद्दी, थोड़ी अल्हड़ लेकिन थी तो पढने में होशियार तो सात खून माफ़ |
        छठी क्लास में नवोदय विद्यालय की परीक्षा में पास हुई | परिवार में सब खुश थे, बहुत खुश और वो भी थी, लेकिन रोये ही जा रही थी | क्यों, क्योंकि अब उसे दूर रहना पड़ेगा अपने घर से चूँकि नवोदय विद्यालय तो दरभंगा शहर से दूर था | जाने के समय में तो खूब पैर पटक - पटक कर विलाप कर रही थी | छठी क्लास में तो सभी बच्चे ही होते हैं न, खास कर वो जो बचपन से अपने परिवार के साथ रहकर पढ़ते हैं | लेकिन जैसे ही आप पढ़ने के लिए गृहत्याग करते हो तो ज्ञान में वृद्धि यकायक होने लगती है और आप अल्प समय में ही अनुभवी हो जाते हैं | हाँ, ये अलग बात है की सभी का ज्ञान - क्षेत्र अलग - अलग होता है, स्वभावनुसार |
        इस प्रकार राजकुमारी किरण हॉस्टल पहुँच गई | "ऊंह, यहाँ पर तो टीवी भी नहीं है, बेड कितना पतला है, खाना भी बेकार है, पता नहीं सारे स्टूडेंट कैसे खाते हैं, छीह"- आरंभ में यही हाल रहा किरण का | लेकिन धीरे - धीरे किरण फलक से उतर कर जमीन पर चलने लगी, गुलाबजामुन से आम हो गई | होता है भाई, जब परिस्थितियाँ ही अंगूठा दिखाने लगे तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है | .............क्रमशः