Friday, 20 September 2013

संस्मरण : सरसों के तेल से बॉडीलोशन तक


मौसम में कुछ बदलाव सा आभास हो रहा है| सर्दी का महीना धीरे – धीरे बूढा होता जा रहा है| वातावरण में नमी की कमी महसूस होने लगी है| इस मौसम में शरीर की त्वचा भी वातावरण से सांठ – गांठ करते हुए खुश्क हो जाती है| यह अजीब सा रूखापन शरीर के साथ मन को भी चिड़चिड़ा कर देता है| नमी के संतुलन को बनाए रखने के लिए या यूँ कहे की बॉडी लोशन का प्रयोग करके हम प्रकृति की आँखों में धूल झोंक कर अपने शारीरिक मानसिक रूखापन का अंत कर देते हैं|  
आज प्रकृति से मेरी मुठभेड़ हो गई| ऑफिस जाने से पहले मैंने जो लोशन लगाया, वह घर पहुँचने से पहले ही दगा दे गई| दुबारा शाम में लोशन लगाना पड़ा| जब मैं अपने कठोड़ त्वचा को विजयी बना रहा था तो अचानक मस्तिष्क में कौंध सा गया कि कभी मैं इस महंगे, सुगंधित और जाने कौन–कौन से शुद्ध–अशुद्ध पदार्थों का सम्मिश्रण कर बनाए गए इस लोशन की जगह सौ फ़ीसदी शुद्ध सरसों का तेल लगाया करता था| वह तेल चूँकि पड़ोस के गाँव में ही पेड़ाई की जाती थी इसीलिए उसकी शुद्धता पर कोई शक नहीं था| गाँव में जब तेलिन “तेल लेब हो” चिल्लाते हुए तेल बेचने आती तो हमलोग वहाँ दौड़कर पहुँच जाते थे और तेल की शुद्धता की परीक्षा के बहाने सर से पैर तक तेल लगा लेते थे और अंत में निर्णायक की भूमिका में आ ये कहकर की “तुम्हारे तेल में मिलावट है हम नहीं खरीदेंगे” घर की तरफ सीना फुलाकर ऐसे निकल पड़ते जैसे की मैदान मार लिया हो|
किसी विशेष मौसम में त्वचा खुश्क होने की समस्या मुझे बचपन से ही रही है| समस्या तब ज्यादा विकराल हो जाती थी जब मुंडन, जनेऊ, विवाह या ऐसे ही किसी विशेष मांगलिक उत्सव में किसी अतिथि के घर मुझे ही अपने घर का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेज दिया जाता था | मैं बहुत विकट संकट में फँस जाता था| एक तो आरंभ से ही शर्मीला रहा हूँ और किसी से बातचीत करने में  कतराता हूँ, खास कर नए लोगों से, दूसरी, मेरी जालिम त्वचा| मैं ईश्वर से प्रार्थना करता कि हे ईश्वर किसी तरह छुपा कर सरसों तेल की व्यवस्था करवा देना| लेकिन भगवान निर्बलों की क्यों सुने भला, वो तो उसकी सुनते हैं जो चालीस मन के सोने का मुकुट चढ़ाए या करोड़ो का गुप्त दान अर्पित करे| वह सरसों का तेल ही था जो मुझ असामान्य मनुष्य को सामान्य बनाए रखने में मदद करता था| आखिर मैं वहाँ कैसे कह पाता कि मुझे बदन में लगाने के लिए सरसों का तेल दो| अपनी छोटी उम्र की बड़ी इज्जत का मुझे बखूबी ख़याल था| बच्चों की आत्मा बड़ी होती है, मैं छोटा था तो मेरी भी आत्मा बड़ी थी, लेकिन मैं जैसे–जैसे बड़ा होता गया हूँ, गाँव से शहर की ओर पलायन उसी क्रम में होता रहा है– गाँव से छोटा शहर, फिर उससे बड़ा, और बड़ा, बहुत बड़ा और हमारी आत्मा, हमारे शरीर और निवास स्थान के विपरीत जाते हुए छोटी होती गई| शर्मीलापन तो न जाने कब ख़त्म हो गया और अब तो बेगैरत की हद तक निर्लज्ज हो गया हूँ|
मेरी त्वचा ने लोशन का स्वाद पहली बार तब चखा था जब मैंने पढाई के सिलसिले को जारी रखने के लिए गाँव से पहली बार एक छोटे से शहर में अपना डेरा जमाया| एक महीने का खर्च घर से एक ही बार में मिल जाया करता था| खर्च का हिसाब घर में कुछ इस तरह दिखाते थे कि उसमे लोशन पर खर्च दिखे भी नहीं और गृह सरकार से उसके लिए मुद्रा पारित भी हो जाए| लोशन की तरफ आकर्षण के पीछे तीन कारण था – पहला, एक ही स्नेहक पदार्थ का प्रयोग करते-करते मन ऊब सा गया था, दूसरा, लोशन एक आकर्षक डिब्बे में बंद रहती है और दिखने में सुन्दर लगती है और तीसरा, सुगंध| ये तो जगजाहिर है कि सुन्दरता के साथ सुगंध का समायोजन होने पर वह न केवल आकर्षण का केंद्र होती है बल्कि मूल्यवान भी हो जाती है| “सोना में सुगंध” वाला मुहावरा भी तो इसको ही ध्यान में रखकर गढ़ा गया है| तो इस प्रकार गाँव से जैसे–जैसे दूर होता गया सरसों का तेल मेरी त्वचा से फिसलती चली गई तथा मैं सुंगंधयुक्त सुंदरी के गिरफ्त में फँसता चला गया|
अपनी त्वचा को प्राकृतिक प्रकोप से बचाने तथा बढती जा रही उम्र को धोखा देकर स्वंय को जवान बनाए रखने के लिए मैं प्रतिदिन सुबह स्नानादि के बाद उसका उपयोग करता हूँ| मुझे नहीं पता था कि किसी पर इतना निर्भर नहीं होना चाहिए जिससे कि वह अपना गुलाम ही बना ले| ऐसा ही तो हुआ था – पहले मैं अपनी इच्छा से उसका सदुपयोग करता था, किन्तु आज उसने मुझे बाध्य किया कि अब से शाम में भी उसकी कोमलता को अपनी त्वचा पर लेपन करें|
यही सोच रहा हूँ, सचमुच मानव अपनी इच्छाओं का गुलाम ही तो है| जैसे–जैसे हम तथाकथित सभ्य होते गए हैं, हमारी आवश्यकताएँ बढती गई और हमने प्रकृति से, प्राकृतिक वस्तुओं से अपना नाता ही तोड़ लिया तथा कृत्रिमता और यंत्र का सहारा लेकर यंत्र मात्र रह गए हैं| स्वछंदता के स्थान पर गुलामी का जीवन जीने के लिए अभिशप्त| 

Sunday, 15 September 2013

एक यात्रा वैष्णो देवी की


   कुछ दिन पीछे ही वैष्णो देवी की यात्रा सम्पन्न करके वापस दिल्ली पहुँचा हूँ। वहाँ मैंने देखा आस्थाओं का एक ऐसा सैलाब जो उमड़कर दूर निर्जन पहाड़ों में अपने विश्वास की अटूटता को कायम रखने के लिए वैष्णो देवी की छोटी सी शिला पिंड के दर्शन हेतु बड़ी-बड़ी शिलाओं को पार करते हैं। उस आस्था की निर्मल गंगा को नमन, उस विश्वास की प्रचंडता को नमन और नमन मानव मन के सँकरे गह्वर में बसी उस पवित्र भावनाओं को भी, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी आस्था को क्षीण नहीं होने देती, अपने विश्वास की डोर कटने नहीं देती और गह्वर में बसी पवित्र भावनाओं को जिन्दा रखती है।
   आज जबकि देश में सांप्रदायिक शक्तियाँ धर्म और मजहब को पेशा बनाकर इंसानों  में नफ़रतों और साम्प्रदायिक उन्माद की भावनाओं के रावण को उत्तेजित करने का कुकृत्य कर रही है और उस पर अपने स्वार्थ की रोटी सेंक रही है, वहाँ मैंने देखा अपने मजहब को भूलकर धर्म-पथ पर चलने में असमर्थ तीर्थ यात्रियों को अपने पीठ पर बीठाकर ले जाने वाले मुस्लिमों को। मैंने देखा भारत के सुदूर दक्षिण में बसे इसाई परिवारों को और कुछ सिख परिवारों को भी जो इस तथाकथित हिन्दुओं के जन्मसिद्ध अधिकार वाले तीर्थस्थलों का भ्रमण इसलिए भी करते हैं क्योंकि वह हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत है। वास्तव में श्रद्धालुओं का कोई धर्म नहीं होता, वह तो धर्म, मजहब और जाति-पाँति के संकीर्ण मानसिकता से परे होता है। उसे तो अपने श्रद्धेय पर अटूट विश्वास होता है और रिश्ता, भक्त - भगवान का बन जाता है।
   यदि श्रद्धेय और श्रद्धालुओं के बीच का रिश्ता इसी कदर अटूट बना रहा।  यदि लोग इसी तरह अपने धर्म, मजहब और जाति-पाँति को भूलकर इस धर्म-पथ को अपना कर्तव्य-पथ बनाने लगे और स्वंय को इस संकीर्ण दीवारों की कैद से मुक्त कर एक दूसरों के साथ इंसान-इंसान और भाईचारा का रिश्ता कायम करने लगे तो वह दिन दूर नहीं होगा जब देश से असामाजिक तत्व नष्ट हो जाएंगे और हमारा देश विश्व शांति का अग्रदूत बन जाएगा। वैष्णो देवी से हमारी यही प्रार्थना है। जय माता दी।

Tuesday, 3 September 2013

कांटे की व्यथा कथा

फूलों की कोमल पत्ती को 
तोड़ न ले जाए माली,
दिन-रात यहाँ करता रहता
हूँ इसीलिए पहरेदारी |

विश्राम मैं कभी करू न
सहूँ मैं झंझों के झोके,
खड़ा हमेशा रहता हूँ
आहत का क्रंदन उर लेके|

यह पौध हमें क्यों पाल रहा
यह कठिन परीक्षा साल रहा,
पांडव जैसा हो गया गति
लुट गयी हजारों द्रौपदी,
आते जब कोई चुनने को
मैं मौन खड़ा देखा करता,
अपने क्रंदन और पीड़ा को
न उसके कर में हूँ भरता,
अब कौन कृष्ण कहलायेगा
गीता का सार सुनाएगा,
विष मेरे शीर्ष भी उगलेंगे
कोमल पत्ती सुरभित होंगे|

पर एक बात अब भी चुभता
ऐसी सुन्दरता ही क्या
कर सके जो न अपनी रक्षा,
अपनी रक्षा - अपनी रक्षा| 

Tuesday, 2 April 2013

नितांत अकेला

 जब कभी मैंने
नए रिश्ते बनाए हैं
सपनों के महल सजाएं हैं 
 पूर्णिमा के चाँद की तरह 
खुशियाँ दमकने लगती है 
भाग्य बुलबुल की तरह 
मन की खिड़कियों पर चहकने लगती है
किन्तु, उसी क्षण 
चाँद बनता है
काले बादलों का ग्रास 
हमारी अपेक्षाएँ बढती है और 
रिश्तों में आ जाती है खटास,
लोग मुझे अब जानने लगे हैं 
इस क्षत - विक्षत व्यक्तित्व को 
पहचानने लगे हैं,
अब कुछ मुझसे कतराते हैं 
और कुछ को नहीं जँचता हूँ 
इसीलिए जो दूर भागते हैं 
मैं भी उनसे बचता हूँ,
भय के वशीभूत होकर मैंने 
सारे रिश्ते तोड़ दिए हैं 
नए रिश्ते बनाने छोड़ दिए हैं 
और हरवक्त - हमेशा 
दुनिया की इस भीड़ में 
रहता हूँ अपनों से दूर अकेला 
और नितांत अकेला । 

Tuesday, 26 February 2013

कुछ तुम बोलो कुछ मैं बोलूँ ।

कुछ तुम बोलो कुछ  मैं बोलूँ
क्यों मध्य पड़ी गहरी गाँठे
कर आगे कर मिलकर खोलूँ
कुछ तुम बोलो कुछ मैं बोलूँ ।

क्यों छोटा गड्ढा जन्म लिया
धीरे - धीरे यह क्यों पसरा
यह पता नहीं तुम क्यों बिफरे
यह भी न पता मैं क्यों अकड़ा,
गड्ढे का कीचड़ चादर पर
आओ मिलकर उसको धो लूँ ।
कुछ तुम बोलो कुछ मैं बोलूँ ।

निराशा और घृणा की बदली
बादल बन मुझको घेर रखा
तेरी आशाएँ ध्वस्त हुई
मैं भी तुमसे कुछ कह न सका,
बदली बरसे आँसू बनकर
मिलकर आओ पलभर रो लूँ ।
कुछ तुम बोलो कुछ मैं बोलूँ ।

तू दोष मढ़े मेरे सिर पर
तुमको जब मुझसे द्वंद्व हुआ
लेकिन यह भूल तुम्हारा है
मुझमे भी अन्तर्द्वन्द्व हुआ,
मत लाश को ला देगी बदबू
आ खुद को खुद से ही तोलूँ ।
कुछ तुम बोलो कुछ मैं बोलूँ ।

मैं भी यायावर तू भी है
कुछ दिन तो साथ रहना होगा
क्यों बैर बढ़े तुम भी सोचो
सुख - दुःख भी बाँट सहना होगा,
सब लोग रहेंगे हँसी ख़ुशी
आ सुन्दर सपने संजो लूँ ।
कुछ तुम बोलो कुछ मैं बोलूँ ।




Saturday, 16 February 2013

निःश्चल सज्जनता


राहें सूनी है दूर - दूर 
सब छोड़  मुसाफिर चले गए,
और सज्जनता उपहास बना 
जब - तब देखो हम छले गए ।

अनजान डगर पर निकले थे,
थे दिल के  हम भोले - भाले,
वह चोर लुटेरा ठग निकला 
जिस - जिसको समझे रखवाले,
सब करते रहे कंदुक - क्रीडा 
मच्छर की भाँति मले गए ।

यह सज्जनता और भोलापन 
अब अवगुण कहते सब जग में,
पर सोच मुसाफिर दुर्जन तो 
मिलते ही रहेंगे पग - पग में,
जब दृढ दुर्जन दुर्जनता पर 
तो मैं सज्जनता क्यों छोडूँ,
जाने दो मलो नहीं हाथ कभी 
यह सोच सही है भले गए ।



Monday, 4 February 2013

अरे हिमालय बता मुझे



अरे हिमालय बता मुझे
ये क्या होता है?
गंगा यमुना बहती है,
या तू रोता है?

गंगा धार बनी है किसकी याद बता,
किसकी यादें रही अभी तक तुझे सता,

तुम किस आशा में चिरकालों से हुए खड़े,
झंझा - तूफान, गर्जन - तर्जन से लड़े - अड़े,

किस विरहा में धीरे - धीरे घुले जा रहे,
किसकी यादों में स्वंय भूले जा रहे,

तुम्हे नहीं पता गंगा की धारों में
हँस - हँस लोग पाप धोते हैं,
इधर किसी का घर जलता है
और कोई हाथ सेते हैं।

यह मेरी वाणी जब तक गंगा धार
सिन्धु में नाद रहेगी,
दुनिया तेरी विरह कथा को याद करेगी।

है मुझे पता यदि कोई ऐसे धीर बनेगा ,
प्रेम मिले न मिले प्रेम की पीर बनेगा।