Tuesday, 3 September 2013

कांटे की व्यथा कथा

फूलों की कोमल पत्ती को 
तोड़ न ले जाए माली,
दिन-रात यहाँ करता रहता
हूँ इसीलिए पहरेदारी |

विश्राम मैं कभी करू न
सहूँ मैं झंझों के झोके,
खड़ा हमेशा रहता हूँ
आहत का क्रंदन उर लेके|

यह पौध हमें क्यों पाल रहा
यह कठिन परीक्षा साल रहा,
पांडव जैसा हो गया गति
लुट गयी हजारों द्रौपदी,
आते जब कोई चुनने को
मैं मौन खड़ा देखा करता,
अपने क्रंदन और पीड़ा को
न उसके कर में हूँ भरता,
अब कौन कृष्ण कहलायेगा
गीता का सार सुनाएगा,
विष मेरे शीर्ष भी उगलेंगे
कोमल पत्ती सुरभित होंगे|

पर एक बात अब भी चुभता
ऐसी सुन्दरता ही क्या
कर सके जो न अपनी रक्षा,
अपनी रक्षा - अपनी रक्षा| 

Tuesday, 2 April 2013

नितांत अकेला

 जब कभी मैंने
नए रिश्ते बनाए हैं
सपनों के महल सजाएं हैं 
 पूर्णिमा के चाँद की तरह 
खुशियाँ दमकने लगती है 
भाग्य बुलबुल की तरह 
मन की खिड़कियों पर चहकने लगती है
किन्तु, उसी क्षण 
चाँद बनता है
काले बादलों का ग्रास 
हमारी अपेक्षाएँ बढती है और 
रिश्तों में आ जाती है खटास,
लोग मुझे अब जानने लगे हैं 
इस क्षत - विक्षत व्यक्तित्व को 
पहचानने लगे हैं,
अब कुछ मुझसे कतराते हैं 
और कुछ को नहीं जँचता हूँ 
इसीलिए जो दूर भागते हैं 
मैं भी उनसे बचता हूँ,
भय के वशीभूत होकर मैंने 
सारे रिश्ते तोड़ दिए हैं 
नए रिश्ते बनाने छोड़ दिए हैं 
और हरवक्त - हमेशा 
दुनिया की इस भीड़ में 
रहता हूँ अपनों से दूर अकेला 
और नितांत अकेला । 

Tuesday, 26 February 2013

कुछ तुम बोलो कुछ मैं बोलूँ ।

कुछ तुम बोलो कुछ  मैं बोलूँ
क्यों मध्य पड़ी गहरी गाँठे
कर आगे कर मिलकर खोलूँ
कुछ तुम बोलो कुछ मैं बोलूँ ।

क्यों छोटा गड्ढा जन्म लिया
धीरे - धीरे यह क्यों पसरा
यह पता नहीं तुम क्यों बिफरे
यह भी न पता मैं क्यों अकड़ा,
गड्ढे का कीचड़ चादर पर
आओ मिलकर उसको धो लूँ ।
कुछ तुम बोलो कुछ मैं बोलूँ ।

निराशा और घृणा की बदली
बादल बन मुझको घेर रखा
तेरी आशाएँ ध्वस्त हुई
मैं भी तुमसे कुछ कह न सका,
बदली बरसे आँसू बनकर
मिलकर आओ पलभर रो लूँ ।
कुछ तुम बोलो कुछ मैं बोलूँ ।

तू दोष मढ़े मेरे सिर पर
तुमको जब मुझसे द्वंद्व हुआ
लेकिन यह भूल तुम्हारा है
मुझमे भी अन्तर्द्वन्द्व हुआ,
मत लाश को ला देगी बदबू
आ खुद को खुद से ही तोलूँ ।
कुछ तुम बोलो कुछ मैं बोलूँ ।

मैं भी यायावर तू भी है
कुछ दिन तो साथ रहना होगा
क्यों बैर बढ़े तुम भी सोचो
सुख - दुःख भी बाँट सहना होगा,
सब लोग रहेंगे हँसी ख़ुशी
आ सुन्दर सपने संजो लूँ ।
कुछ तुम बोलो कुछ मैं बोलूँ ।




Saturday, 16 February 2013

निःश्चल सज्जनता


राहें सूनी है दूर - दूर 
सब छोड़  मुसाफिर चले गए,
और सज्जनता उपहास बना 
जब - तब देखो हम छले गए ।

अनजान डगर पर निकले थे,
थे दिल के  हम भोले - भाले,
वह चोर लुटेरा ठग निकला 
जिस - जिसको समझे रखवाले,
सब करते रहे कंदुक - क्रीडा 
मच्छर की भाँति मले गए ।

यह सज्जनता और भोलापन 
अब अवगुण कहते सब जग में,
पर सोच मुसाफिर दुर्जन तो 
मिलते ही रहेंगे पग - पग में,
जब दृढ दुर्जन दुर्जनता पर 
तो मैं सज्जनता क्यों छोडूँ,
जाने दो मलो नहीं हाथ कभी 
यह सोच सही है भले गए ।



Monday, 4 February 2013

अरे हिमालय बता मुझे



अरे हिमालय बता मुझे
ये क्या होता है?
गंगा यमुना बहती है,
या तू रोता है?

गंगा धार बनी है किसकी याद बता,
किसकी यादें रही अभी तक तुझे सता,

तुम किस आशा में चिरकालों से हुए खड़े,
झंझा - तूफान, गर्जन - तर्जन से लड़े - अड़े,

किस विरहा में धीरे - धीरे घुले जा रहे,
किसकी यादों में स्वंय भूले जा रहे,

तुम्हे नहीं पता गंगा की धारों में
हँस - हँस लोग पाप धोते हैं,
इधर किसी का घर जलता है
और कोई हाथ सेते हैं।

यह मेरी वाणी जब तक गंगा धार
सिन्धु में नाद रहेगी,
दुनिया तेरी विरह कथा को याद करेगी।

है मुझे पता यदि कोई ऐसे धीर बनेगा ,
प्रेम मिले न मिले प्रेम की पीर बनेगा।

Monday, 27 August 2012

कांटे की व्यथा कथा


फूलों की कोमल पत्ती को
तोड़ न ले जाए माली,
दिन-रात यहाँ करता रहता
हूँ इसीलिए पहरेदारी|

विश्राम मैं कभी करू न 
सहूँ मैं झंझों के झोके,
खड़ा हमेशा रहता हूँ
आहत का क्रंदन उर लेके|

यह पौध हमें क्यों पाल रहा
यह कठिन परीक्षा साल रहा,
पांडव जैसा हो गया गति 
लुट गयी हजारों द्रौपदी,
आते जब कोई चुनने को
मैं मौन खड़ा देखा करता,
अपने क्रंदन और पीड़ा को
न उसके कर में हूँ भरता,
अब कौन कृष्ण कहलायेगा 
गीता का सार सुनाएगा,
विष मेरे शीर्ष भी उगलेंगे 
कोमल पत्ती सुरभित होंगे|

पर एक बात अब भी चुभता
ऐसी सुन्दरता ही क्या,
कर सके जो न अपनी रक्षा
अपनी रक्षा - अपनी रक्षा| 

Wednesday, 8 August 2012

बादल उमड़ा

बादल उमड़ा,
मुझे किसी ने याद किया क्या?
बादल गरजा,
विरह की मारी याद किया क्या?
बरसा बादल,
मुझे लगा वह मीरा बनकर नाच रही है,
विह्वलता में प्रेम गहनता जाँच रही है,
बूंद बरस कर मिट्टी के तन पोर-पोर में समा गया है,
सोंधी खुशबू भूली नेह को जगा गया है,
हरी दूब जो झुलस गयी थी हरा हो गया,
मीरा के नटनागर बनने खड़ा हो गया|