Saturday, 7 January 2012

जो तुम कहो

 आज फिर सितार को संवार लूँ
जो तुम कहो,
उँगलियों को तार पे बुहार दूँ
जो तुम कहो|

छेड़ दू वह राग जोकि
शांत जग का गान है,
चैन चहुँ चाहिये
यह गान ही तो प्राण है,
माह चली उष्ण की, फुहार दूँ
जो तुम कहो|

राग उपजे तर्जनी से
या सितार तार से,
यह मधुरतम कल्पना
सहयोग कोमल प्यार से,
जग भयाकुल मैं सभी को, प्यार दूँ
जो तुम कहो|

कुछ भी करूँ और न डरूं
जब तेरा आदेश हो,
तब कार्य भी होंगे सफल
जब पूछ श्री गणेश हो,
ले इम्तिहान स्वयं को, निसार दूँ
जो तुम कहो|
आज फिर सितार को संवार लूँ
जो तुम कहो|



स्नेह और प्यार

 स्नेह से  पूरित,
प्यार से भरा,
एक छोटा सा दिया;
तुम्हारे आँगन के
चौबारे पे,
मैंने रख दिया|

प्रेम मौन है

प्रेम मौन है -
उड़ जाते पिंजरे का पंछी,
बता दिया कब कहाँ कौन है|

अपना कर जिसने भी प्यार को
लेप लगाकर भरा दरार को,
तुच्छ हृदय के कटु  वचनों को
सर पर लिया सब लतार को;

दूरी और बढती खाई को
पाट दिया है अपनेपन से
है आमंत्रण सब के दुःख को
अपने मन से बड़े मगन से;
मेरे लिए तो सब अपना है
तुम्ही बता यहाँ दूजा कौन है?

क्यों बोलूं मैं प्रेम पथिक हूँ
माले का मोती स्फटिक हूँ,
यह स्वार्थ है लिप्सा है यह
मुझे तो बस ऐसा ही लगता
तुम्हे क्या लगता है तूहीं कह;
मेरे लिए तो जीवन सत्य है
मृत्यु तो लघु लघुम गौण है|

Tuesday, 3 January 2012

पत्ता मिट्टी बन गया

हरे पत्ते
धीरे - धीरे
पीले पड़े.

पीले पत्ते
हवा के संग
गिर पड़े.

गिरे पत्ते
धीरे - धीरे
गलने लगे.

गले पत्ते
मिट्टी में मिल
होने लगे मिट्टी.

और कुछ समय बाद
अंतर हो गया ख़त्म
पत्ता मिट्टी बन गया.

एक बुराई

मुझमे एक बुराई है और
एक बुराई तुझमे भी,
मैं सच को भी तुम्हारे
कह देता हूँ झूठ है,
और तुम अपने झूठ को
कहते रहते हो सच.

और अंततः,
स्वीकारता हूँ मैं तुम्हारे सच को,
किन्तु तुम अब भी तुले हो
अपने झूठ को
मनवाने के लिए सच,
बस मेरा तो इतना ही कहना है
इस बुराई से
जितनी जल्दी हो सके बच.

Thursday, 15 December 2011

वंशजो के लिए

चकमकाती बहुमंजीली इमारतों का रहस्य 
उसकी नीव उसका आधार है.
वही है उसकी जीवन्तता का सहारा
जिसने संपूर्ण जीवन उसी के लिए वारा |

इमारतें इतराती, 
अपने अंदर होने वाली बैठकें गोस्ठियों पर 
प्रसन्नचित होकर समझती 
अपने को मूल्यवान  धरोहर |

इमारतें मगरूर,
आकर्षणमयी सुन्दरता के नशे में चूर.
उसे पता नहीं है वास्तविकता 
आखिर क्या है सत्य में,
कौन है उसका सहायक
इस नाटक के नेपथ्य में.

उसे पता नहीं है नींव की पहचान
कौन है आधार उसका प्राण,
मिटटी का मोटा पाट जिसका कफ़न है 
जो बरसों से जिन्दा कब्र में दफ़न है,
सहने को तैयार है गुमनामी की जिन्दगी 
जीने को तैयार है मरने की सी जिन्दगी,
बस: अपने आश्रितों को जिलाने के लिए 
अपने वंशजों को पहचान दिलाने की लिए |

Saturday, 5 November 2011

जनम- जनम तक

 कब से देखा है तुम्हारी बाट एकटक .

नैनों में अश्रुजल छलका,
विरह भाव है यह पल- पल का,
हृदय में ऐसी अगन लगी है
अगन हो मनो दावानल का,
खड़ा राह पर पंथ निहारा शाम-रात तक.

चीखें सुन स्तब्ध हो मानो सभी हवाएं,
चूका जा रहा अब मेरी सारी क्षमताएँ,
अब तक अपनी आसूं से भीगे पलकों से 
लिखा है मैंने कई मेघदूत, कई ऋचाएं.
पूछा गंगा की लहरों से सागर तट तक.

घने बसे यादों के तेरे इस जंगल में,
किस विशेष तरु- तल बैठूं मै इस विह्वल में,
सशरीर मुझे गल-गल आसूं बन जाने दो 
धस जाने दो खुद से निर्मित इस दल-दल में.
पूछा घनी घटा से लेकर मस्त पवन तक.
बाट जोहता एक जनम नहीं, जनम- जनम तक.